61. Desire for a blissful state
61. Desire for a blissful state
मैं अपने लिए परमानंदमय वर्तमान और भविष्य चाहता हूं। वह क्या है ? जीवन में वैराग्य और मृत्यु के बाद सायुज्य ? नहीं। मृत्यु के बाद non - existence, अनस्तित्व ? होगा तो यही, पर मैं चाहता इसे नहीं हूं।
मैं चाहता हूं मनुष्य के रूप में पुनर्जन्म। एक साधारण हिंदू परिवार में, साधारण आर्थिक स्थिति में, जीवन जिसमें खाने, पहनने, पढ़ने, रहने की सुविधा हो; मां - बाप अपनी पूरी उम्र जीएं और मैं उनकी सेवा करूं, पुत्र - पुत्री भी वैसे ही जिएं और योग्य हों; मैं एम.ए. तक पढूं और राजकीय सेवा करूं; वर्तमान मेधा जैसी ही मेरी मेधा रहे; ऐसा ही अध्ययन का उत्साह रहे; ऐसा ही सिद्धांत - पारायण रहूं; प्रत्येक कक्षा में पाठ्यक्रम का पूर्ण अध्ययन करूं और छात्रवृत्ति लूं; मानव- मात्र से प्रेम करूं; सामान्य सुख - दु:ख में रहूँ - दुख आएं, मैं प्रार्थना करूं, वे हट जाएं; और भगवान के चरणों में मेरी निरंतर प्रीति रहे। दुर्बलताएं आएं, पर वे मानसिक स्तर से आगे न बढ़ें और मैं उन पर विजय पा लिया करूं।
ऐसा ही जन्म मैं बार-बार ग्रहण करूं और कभी मुक्त न होऊँ।
62. राम, कृष्ण और गांधी
पृथ्वी का भार उतारने के लिए दुष्टों का नाश करना प्रकृति की अथवा ईश्वर की, कार्य - प्रणाली के मेल में नहीं है । प्रकृति गंदे स्थान को नष्ट नहीं करती, उन्हें साफ करती है; वह शरीर के गंदे खून को नष्ट करके साफ खून निर्माण करने का व्यय साध्य उपक्रम नहीं अपनाती, बल्कि शरीर में रक्त प्रवाह के चक्रीय उपक्रम द्वारा रक्त की केवल गंदगी मिटा कर उसे स्वच्छ कर डालती है। नदियों, गड्ढ़ों, नालियों, समुद्रों के गंदे जलों को लेकर वाष्पीकरण और घनीभवन की क्रियाओं द्वारा वर्षा का स्वच्छ जल प्रदान करती है। इसलिए पृथ्वी के भार - हरण हेतु दुष्टों का विनाश उसके कार्य के मेल में नहीं है, उनका सुधार और परिष्कार मेल में है। राम ने असंख्य राक्षस और दुष्ट मारे; कृष्ण ने असंख्य पापी मानवों का संहार कराया। बुरे तो नष्ट हो गए, पर नए बुरे आ गए - कलयुग आ गया।
दूसरी ओर, गांधी ने सुधार - परिष्कार और हृदय - परिवर्तन का रास्ता अपनाया और भारत में क्या, संसार भर में एक नया, शुभ्रतर युग आया। आततायियों का कुछ ही हद तक हृदय - परिवर्तन हुआ और पीड़ितों में उच्छृंखलता ही आई, पर दुनिया ने नया युग देखा - भौमिक उपनिवेशवाद का विनाश हो गया।
63. रामचरितमानस
रामायण उदात्त है, गीता और उपनिषदों से मुझे मतभेद है, महाभारत अपने वर्तमान रूप में गुण- दोषमय है, पर यह है रामचरितमानस, जिसमें दोष नहीं, जिससे मेरा कहीं मतभेद नहीं, और जो गंगा की पुनीत, सुखद, मधुर, अविराम धारा के समान मेरे मन को अपने प्रवाह के साथ बहा ले चलता है।
मन नहीं लगता, तो रामचरितमानस क्यों नहीं पढ़ते ? कुछ भी पढ़ने का जी नहीं चाहता, तो रामचरितमानस पढ़िए। मन उदास या दुखी है, तब भी मानस पढ़िए, मन का पाप नहीं छोड़ रहा है तो मानस पढ़िए; पाप छोड़कर भाग जाएगा। मन लगने लगेगा, वह सुखी हो जाएगा। ऐसा और कोई पुस्तक - Iliad, रंगभूमि, रामायण, महाभारत, गीता, उपनिषद - पढ़ने से नहीं होगा। तुलसी का भक्त मन उमड़ पड़ा है। वही मानस हैं। यह उनके हृदय की वाणी है। हृदय की वाणी सीधे हृदय में प्रवेश करती है, बुद्धि के माध्यम से नहीं, जैसे गांधी की वाणी प्रवेश करती थी। इसीलिए वह पापनाशिनी है, जैसे गांधी की कर्मोद्भावनी थी।
अभी तक पढ़ी सभी पुस्तकों में दो मुझे सर्वोत्कृष्ट लगती हैं, हृदय के स्तर पर मानस और बुद्धि के स्तर पर नेहरू जी की Autobiography.
कितना अंतर है मानस और उस 10वीं शताब्दी की कृति भागवत में। एक तो कृष्ण का चरित्र ही उदात्त नहीं, राक्षस या आसुर है; घोर कामुकता से भरा है; विश्वसनीय भी नहीं। भागवत में भक्ति है जो forced है, वह अपने आप में लुभाने वाली नहीं, मोहक है, पर झूठे वादों पर अवलंबित है। धर्म (के लोक रक्षक स्वरूप) का तो कहीं पता ही नहीं। कृष्ण के अवैध कृत्यों को divine बता कर कवि ने धर्म की कोई परवाह ही नहीं की है। यदि हम आंख मूंद कर और बुद्धि को सर्वथा दरकिनार रखकर भागवत कार की बातें मानते चलें तो हम कृष्ण के भक्त हो सकते हैं। पर मनुष्य होते हुए हम ये दोनों काम कैसे कर सकते हैं ? और ऐसी भक्ति भी किस काम की ? नाचने - गाने के अलावा उसमें है क्या ?
मानस के राम का चरित्र अनुकरणीय है, आदर्श है। उनमें अलौकिकता है, पर इतना कम कि उनके बिना कथा का स्वरूप नहीं बिगड़ता। वह गंगा है , तो भागवत शहर का नाला ।
मानस में क्या है ? परम उत्कृष्ट कवित्व है, जो शेक्सपियर की कोटि का है। परम उत्कृष्ट भक्ति है, जो शुद्ध स्वर्ण है। वह भक्ति धर्म के उज्ज्वलतम रूप से समन्वित है जो मणि है। राम, लक्ष्मण, भरत, दशरथ, सीता, कौशल्या, सुमित्रा, हनुमान जैसे उदात्त पात्र हैं। रावण, मेघनाद भी पापमूर्ति नहीं, अहंकार मूर्ति हैं। उनके चरित्र का भी एक standard है। सुग्रीव, विभीषण, कैकेयी भी सत्पात्र हैं ; केवल कहीं-कहीं स्खलित हो गए हैं। इन सब गुणों के साथ उसकी त्रुटियां, जो हैं और अनेक हैं, पर बहुत ही छोटी-छोटी हैं,गंगा पर पड़ी हुई धूल के समान हैं।
64. भाव और विचार
17/01/1990
वेद ने मनुष्य के जीवन की अवधि 100 वर्ष मानी है। गांधी जी ने तो 120 वर्ष जीने की इच्छा की थी। यद्यपि वे 78 वर्ष 3 माह ही जी सके थे। मेरी अवस्था अभी 75 वर्ष की है। मेरी आंखें रूग्ण हो गई हैं। शरीर भी आंशिक पक्षाघात से आक्रांत हो गया है। यद्यपि मेरी इच्छा शक्ति और संकल्प के कारण उस पर कुछ हद तक विजय प्राप्त हो गई थी। इधर शीत लहर के काल में इसका एक हल्का आक्रमण फिर हुआ, जो अब ह्रास पर है। रक्तचाप जो की 230/110 हो गया था, अब 160/90 पर आ गया है । रक्त में चीनी की मात्रा 100-129 मात्र है। अतः यद्यपि मैं रुग्ण हीं हूं, फिर भी स्वस्थ हो जाने की आशा है तथा 5 - 7 वर्ष और जीने की संभावना जान पड़ती है। यह तो शरीर की स्थिति के आधार पर अनुमान किया गया। आंखों का ऑपरेशन किया जाएगा और चूकि चीनी की मात्रा शरीर में कम है, अतः दृष्टि के भी लौट आने की आशा है। अतः जीवन की ओर मैं आशाप्रद दृष्टि से देख रहा हूं। यह भी संभव मालूम होता है कि फिर कुछ लिख - पढ़ सकूं और दुनिया को कुछ दे सकूं। दुनिया को कुछ देने की मेरी इच्छा प्रबल है। मैं समझता हूं कि अपने विचारों और भावों के द्वारा मैं दुनिया का बहुत कुछ उपकार कर सकता हूं और उसकी क्षमता भी मुझ में है। मैं अपने चारों ओर दूर-दूर तक के लोगों को, बहुत अधिक पढ़े-लिखे और उच्च पदस्थ लोगों को भी, अपने से पीछे देखता हूं। अतः संभव मालूम होता है कि अपनी इस इच्छा के कारण मेरी आयु भी अधिक होगी।
65. मेरे ईश्वरीय बचाव
13/8/1989
(1)
उस समय मैं रिटायर नहीं हुआ था। शायद 1976 था। रिटायर होने ही वाला था। मैं सपरिवार दो महीने की छुट्टी में घर आया था। अंतिम बार सपरिवार बाढ़ लौट रहा था। घर से बस द्वारा आरा स्टेशन पर उतरने वाला था, उसी समय एक बाहरी आदमी अपने सिर पर मेरा सामान चढ़ाने लगा। पूछने पर बोला - मैं प्लेटफार्म पर सामान पहुंचा दूंगा। मैंने कहा - मैं 40 पैसे दूंगा, जो उस समय रेलवे का रेट था। वह बिना कुछ कहे सामान लेकर प्लेटफार्म की ओर चला। सपरिवार मैं उसके पीछे-पीछे चला। प्लेटफार्म पर सामान उतार कर वह बोला - हुजूर, मैं नाजायज कुली हूं; सामान गाड़ी पर चढाने का मुझे आदेश नहीं है, इसलिए मैं गाड़ी पर नहीं चढ़ाऊंगा। मैंने कहा- तब आधी मजदूरी मिलेगी। उसने आंखें तरेर कर कहा- मैं डेढ़ रुपए से एक पैसे कम न लूंगा। मैं सामान का भारीपन देखकर 50 पैसे देना स्वीकार किया, पर अब उसने कहा- देखूंगा कि तुम डेढ़ रुपए दिए बिना कैसे गाड़ी पर चढ़ते हो ? मैं तो बड़े फेर में पड़ा। इधर-उधर देखने लगा कि शायद कोई रेलवे का आदमी या सिपाही मिले, पर रेलवे का आदमी या सिपाही यात्रियों की सहायता के लिए कहां मिलते हैं ? बहुत देर ठहरने पर भी कोई नहीं दिखा तो मैंने सोचा कि जा कर स्टेशन में ही खबर कर दूं, पर उसने दौड़ कर मेरा हाथ पकड़ कर मुझे रोका। ठीक उसी समय वेशभूषा से संभ्रांत एक अपरिचित व्यक्ति वहां आ पहुंचा और उसकी गर्दन पकड़ ली। साथ ही मेरे भांनजे प्राचार्य अवधेश कुमार सिन्हा भी दिखे। उन्होंने आकर मुझसे पूछा - यह आदमी आपसे क्यों धृष्टता कर रहा है ? मैंने सारी बातें उन दोनो को बताई। दोनों ने उसे खूब डाटा और धमकाया। उसने अपनी गलती मानी और मुझसे माफी मांगने लगा। तब तक गाड़ी आ गई और मैं खुद सारा सामान चढ़ा कर सपरिवार गाड़ी पर चढ़ गया और गाड़ी चलने लगी।
(2)
सितंबर 1977 था। मैं रिटायर हो चुका था। मित्र विदाई की दावतें दे रहे थे। ऐसी ही एक दावत में एक दिन रात के नौ बज गए। मैं घर लौट रहा था। बरसात का दिन था और अंधेरा था। सड़क पक्की, पर भीगी हुई थी। इसी समय मैं सामने से दो जवान नशेबाजों को एक-दूसरे से गुथे हुए अपनी ओर आते देखा। मैं चुपके से उनकी बगल से निकल जाना चाहा, निकट पहुंचते ही वह बोल उठे - कौन है ? मैंने नशेबाजों से कुछ बोलना उचित न समझा तथा चले जाना ही अच्छा समझा। पर उनमें से एक ने मुड़कर मुझे पीछे से खदेड़ा। मैं भागा, वह पीछे दौड़ता हुआ क्रमशः मेरे निकट आने लगा। मैं बेतहाशा दौड़ने लगा। जब वह अत्यंत समीप पहुंचा तो मैंने चिल्लाते हुए किसी के चीख कर गिरने की आवाज सुनी। दरअसल मेरे पीछे आने वाले उस नशेबाज के पांव फिसल गए थे और वह जमीन पर गिरा हुआ था। दूसरा नशेबाज केवल खड़ा होकर उसे देख रहा था। मैं बचकर वहां से एक फर्लांग दूर अपने डेरे पर सही-सलामत पहुंच गया।
(3)
मैं अपने ललाट के एक जख्म की ड्रेसिंग कराने के बाद आरा से लौट रहा था। पीछे से घनघोर बादल घिर आए, चौक पहुंचते-पहुँचते पानी बरसने लगा। मैं एक दुकान में जाकर दरवाजे पर खड़ा हो गया। पानी देर तक जोरों से बरसा, जब जोर कम हुआ तब मैं वहां से उतरा। घुटने भर पानी हेलता और भींगता हुआ बस स्टैंड पर पहुंच एक बस पर बैठ गया, जो तुरंत खुलने वाली ही थी। बस खुली और वहां जाकर एक क्षण रुकी, जहां से दो रास्ते हो जाते थे। कोई टिकट लेने वाला तब तक नहीं आया था। जब बस आगे बढ़ी तो मुझे आसपास का दृश्य कुछ अपरिचित सा लगा। पीछे अपरिचय बढ़ता गया। जब टिकट वाले ने पैसे मांगे तो मैं अपने घर के निकट के पड़ाव तक के पैसे उसके हाथ में दिए। उसने पैसे गिन कर पूछा - आपको कहां जाना है ? मैंने बताया। वह सुनकर घबरा कर बोला - पर आप तो बड़हरा रोड पर हैं। पानी जोरों से बरस रहा था। उसने मुझे पास के दौलतपुर गांव में उचित पैसे लेकर उतार दिया। मैंने एक मंदिर में शरण ली। जोरों की वर्षा में मैं आधा भींग चुका था। काफी देर के बाद वर्षा का जोर कुछ कम हुआ। मैं वहां से निकल कर आगे बढ़ने लगा। मुझे भींगते देखकर वहां ठहरे हुए लोगों ने कहा - आप उस पर क्यों चले गए थे ? यहां बैठिए। कहां जाना है ? मैंने पूछा कि आरा जाने की बस कब तक आएगी ? लोगों ने कहा - उसका तो कोई ठिकाना नहीं है, शाम तक आ सकती है। एक काम कीजिए, साइकिल से आरा चल चलिए। मैंने कहा - साइकिल कहां है ? उनमें से एक नवयुवक ने आग्रह किया - मेरी साइकिल पर बैठ लीजिए। मैंने उसके इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया।और बूढा मैं, उस युवक की साइकिल के लगेज कैरियर पर बैठ गया। वह भला लड़का वर्षा में साइकिल चलाता हुआ आनंद से आरा पहुंच गया और मुझे वही के एक होटल में ठहरने का परामर्श देकर चलता बना। किसी प्रकार का एहसान नहीं जताया। ऐसे लड़के ही देश की निधि हैं। मैं हल्की वर्षा में पैदल ही घर लौट आया।
(4)
मैं सपत्नीक एक संबंधी के यहां गया हुआ था। बस में जाते समय कड़ी धूप थी। अगस्त का महीना था। शाम होते-होते वर्षा होने लगी और तब से रात तक पानी बरसता रहा। हम लोग खा-पी कर सोए, तो रात भर बारिश जोरों से होती रही। सवेरे भी यही जोर रहा। किसी को घर लौटने का साहस न हुआ। किसी ने बात भी न चलाई, यद्यपि वहां का यज्ञ पहले ही दिन समाप्त हो गया था। पानी उस दिन भी लगातार बरसता रहा, रात को और भी जोर हुआ। अब तो तीसरे दिन वहां ठहरना असंभव था। सबके अपने-अपने काम थे। वर्षा की अधिकता के कारण बाढ़ आ जाने का डर था, इसलिए सुबह होते ही सब लोग घर जाने की तैयारी करने लगे। उस वर्षा में भी बच्चियों ने नाश्ता बना ही दिया। भरपूर नाश्ता कर सपत्नीक मैं सड़क पर आया। सौभाग्यवश बस आ गई और मेरे पहुंचने तक रुकी रही। मैं सपत्नीक उसमें सवार करा दिया गया। यह उस सड़क पर चलने वाली अंतिम बस थी। पानी बरस ही रहा था, दोनों ओर जल का समुद्र उमड़ रहा था, रास्ते नहीं सूझ रहे थे। बस दौड़ती हुई मेरे गांव के निकट के पड़ाव तक पहुंची। हम दोनों उतरे। वहां से घर जाने वाली सड़क पर जांघ-भर पानी बह रहा था। सड़क और दोनों ओर के खेत में कोई अंतर नहीं था। हम लोग बस से उतरे ही थे कि दो अनजान लड़के भी उसी बस से कूदे। हम दोनों पानी में उतरे, पर इसके पहले ही दोनों लड़के हमारे आगे-आगे पानी में चलने लगे। मैं उन्हें पहचानता नहीं था। वे आगे-आगे चल कर हमें मार्ग दिखाते हुए हमारा सामान लेकर चलने लगे। मैंने कहा - अब आप लोग भी घर जाइए, हम लोग घर चले जाएंगे। उन्होंने कहा- हम लोग आपको घर तक पहुंचाए बिना नहीं जाएंगे। उन्होंने हमें अपने गांव के बिल्कुल करीब पहुंचा दिया और पूछा - अब तो हम लोग जाएं न ? मैंने बहुत एहसान मानते हुए उनको विदा दी। ऐसे लड़के ही देश के भविष्य बनेंगे।
यह ईश्वरीय बचाव ही था ......।
66. पचहत्तरवां वर्ष
31/08/1989
परसों, 29 अगस्त 1989 को मेरा 75 वां जन्म दिवस था। महाप्रयाण के लिए 75 वां वर्ष जल्दी नहीं है। जवाहरलाल जी इसी उम्र में सिधारे थे। वैसे भी यह वर्ष अनुपयुक्त नहीं है। मोतियाबिंद ने मेरी दोनों आंखें छेंक ली हैं। और यद्यपि ये पंक्तियां मैं स्वयं लिख रहा हूं, मैं कुछ लिख-पढ़ नहीं सकता। यद्यपि अभी पढ़ने को हैं - मानस, रामायण, गीता, प्रेमचंद, प्रसाद, शेक्सपियर, ह्यूगो, थैकरे - यहां तक कि वेल्स, नेहरू, गांधी (दोनों की आत्म कथाएं)। पर मैं इससे लाचार हूं। जीवन में कोई काम नहीं रह गया है। मैं इन्हें और इनके अलावा बहुतों को जितना चाहा है, उतना सबको इच्छा - भर पढ़ लिया है।
जीवन मेरा अच्छा बीता है। सभी तरह के अनुभव प्राप्त हुए हैं। पिता का प्यार, फिर पिता की मृत्यु, गरीबी, बिहार और उड़ीसा भर में अध्ययन - पात्रता में प्रथम स्थान, फिर गिरावट, फिर एक अति सुंदर पत्नी की प्राप्ति, स्वतंत्रता संग्राम में दो वर्ष का जेल, बच्चे की मृत्यु, पत्नी की मृत्यु, दूसरा विवाह, एम. ए. की उपाधि, प्राध्यापक का पद, बेटियां, बेटे, बहुएं, पोतियां, पोते, सभी की प्रचुरता; सब मिला कर जीवन सुखमय बीता है। अब समय आ गया है जाने का। इसलिए मैं प्रसन्न हूं और महायात्रा के लिए तैयार हूं।
मेरे पार्थिव शरीर का दाह - संस्कार निकटतम सिन्हा स्थित गंगा के तट पर (preferably) होना चाहिए। गंगा जी मुझे सदा महिमामयी लगी हैं। दशकर्म, श्राद्ध सभी हिंदू पद्धति के अनुसार होने चाहिए। बाजे बज सकते हैं। पर बहुत अधिक खर्च नहीं होना चाहिए। गोदान नहीं होना चाहिए। मेरा बचा सब कुछ दान में नहीं जाना चाहिए। वे मेरी संतान के लिए हैं - cash भी, kind भी, विशेष कर रेशमी चादर, मेरी किताबें, कपड़े, चारपाई, आदि ।
पुत्र, पतोहुओं, पौत्र, पौत्रियों को प्रथम की इच्छा पर ही छोड़ देना चाहिए ।
67. भाग्य
06/09/1989
हमने देखा है कि प्राणी का पुनर्जन्म होता है - उसकी संतान के रूप में। इस प्रकार मनुष्य के किए हुए कर्मों का (क्योंकि मनुष्य ही कर्म विचारपूर्वक कर सकता है) फल मिलता है, चाहे उसे या समाज को - तत्काल या देर से या पीढ़ियों बाद । इतना मानते हुए भी यह नहीं माना जा सकता कि विधि द्वारा भविष्य में कोई होने वाला कार्य निश्चित है अर्थात किसी चेतन अपर सत्ता द्वारा किसी भाग्य का हमें सामना करना पड़ता है। हो जाने पर ही भाग्य होता है, पहले से कुछ नहीं होता । अतः भाग्य नहीं होता। अदृष्ट होता है, अर्थात कुछ बेजानी हुई घटनाएं भविष्य में घट जाती हैं। कोई अटल भाग्य नहीं है - दुर्भाग्य या सौभाग्य। समुचित सावधानी द्वारा अदृष्ट को बदला जा सकता है।
68. मेरे साथी
08/10/1989
राम मेरे बचपन के साथी थे। राम और शिव की भक्ति मुझे मेरे परिवार से विरासत में मिली। बहुत दिनों तक मैं इस उधेड़बुन में रहा था कि दोनों में बड़ा कौन है? मेरी रुझान शिव की ओर थी। पर ज्यों-ज्यों तुलसीदास के रामायण से मेरा परिचय हुआ, वह राम भक्ति में बदलती गई। अपने गांव की एक मठिया में मैंने सारी रामलीला, नाटक के रूप में खेली जाती हुई, देखी। पीछे सुन्दर कांड और किष्किंधा कांड आदि पढ़े। मैट्रिक में प्रधान हिंदी विषय में फिर रामचरितमानस के दो कांड पढे। एम. ए. में मैंने तुलसीदास विषय ही लिया। कुछ तो विषय की सहजता के कारण और कुछ राम भक्ति के कारण भी। बचपन से ही भक्ति के श्लोक रट लिए। जेल में रामचरितमानस को आद्योपांत पुनः पढा। 1983 में तीसरी बार पढी - विनय पत्रिका, कवितावली, गीतावली। सभी बार-बार पढ़ी। प्रत्येक आवृत्ति में नए-नए श्लोक और छंद याद किया। दु:ख - दर्द के समय और प्राय: प्रतिक्षण राम को याद किया। अब तो वे मेरे जीवन साथी हो गए हैं। अत: वे मेरे सबसे बड़े संगी हैं। जीवन के बाद भी यदि जीवन होगा, तो वे वहां भी मेरे संगी होंगे। लोक में, परलोक में सभी में मेरा उनका साथ रहेगा। इसलिए मृत्यु से मुझे भय ही नहीं है।
मेरे दूसरे आजीवन साथी मेरी किताबें हैं। बड़े प्रेम से जहां कहीं वे मिलीं, मैंने उन्हें पढा। स्कूल, कॉलेज से बाहर मैंने अनेक विषयों पर पुस्तकें पढीं - उपन्यास, नाटक, कविता, भूगोल, इतिहास, प्राचीन, मध्यकालीन, आधुनिक, विश्व इतिहास। इन पुस्तकों को पढ़ने से तृप्ति ही नहीं होती थी। अब अचानक मैं आधान्ध हो गया। किताबें पड़ी हुई हैं, उन्होंने मेरा छोड़ दिया है। उम्र अभी बाकी है, पर उन्होंने मेरा साथ छोड़ा। मैं उनके लिए व्याकुल हूं, पर कुछ कर नहीं सकता।
69. मृत्यु
14/11/1991
मेरा जन्म 29 अगस्त 1915 में हुआ था और आज मैं 76 वर्ष और प्राय: 3 महीने का हो गया हूं। मैं नीरोग हूं।यद्यपि बाएं अंग लकवे के कारण कुछ कमजोर हो गए हैं, पर कमजोरी के अलावा मुझे कोई रोग नहीं। दोनों आंखों में मोतियाबिंद हुआ था और मैं उनका ऑपरेशन दो मास पूर्व करा आया हूं। मुझे सब कुछ दिखाई दे रहा है और मैं भली भांति लिख-पढ़ सकता हूं।
पर कमजोरी जनित व्याधियां मुझे हैं। और मेरी उम्मीद है कि मैं जल्द ही इस शरीर को छोडूंगा। मैं कहां जाऊंगा, इस विषय में मेरा निश्चित मत है। इसलिए मैं भयग्रस्त नहीं हूं ........।