41. Who survive: the Good or the Wicked ?
41. Who survive: the Good or the Wicked ?
Those creatures, in the early stages of the Earth, survived which were the fittest, i.e. who could adapt themselves to their surroundings or, in other words, were more suited to them. Those who could not adapt or were not suited, however big and strong, perished. There was no question of moral or Immoral in such survival.
Latter on, when creatures preyed on one another, those survived which had sharper teeth and claws and which were more agile. The slow and bulky and 'gentle', who did not use their teeth and claws so much, though stronger, perished. In a word, the 'immorals' survived and the 'morals' perished. This happens among the lower animals even today uninterruptedly, as a rule.
In the human world, however, men are organised and are sensible. They can recognise their enemies and act collectively. So the evil-doer, being harmful to others and to society, is recognised sooner or later as an enemy. As some individuals may be stronger than he, he may be humbled or done away with; or society, finding him injurious, may at last get hold of him and strangle him. On the other hand, the moral man is regarded as advantageous to the society and is valued and protected, if he is weak or unwily. The humble man earns friends and is helped; the weak man is regarded uninjurious and is tolerated and sympathised with. Hence the 'good' survive and the 'wicked' perish.
42. अहंकार और प्रेम
यह ठीक है कि अहंकार के विनाश के लिए प्रेम का आश्रय आवश्यक है, जैसे अंधकार के विनाश के लिए दीपक का। पर अहंकार का पूर्ण विनाश ईश्वर के ही समक्ष वांछनीय है।
अपने समकक्ष मानव - बंधुओं के बीच अहंकार का पूर्ण विनाश श्रेय नहीं, यद्यपि प्रेम श्रेय है। इस बीच हमें संघर्ष करना है बुराइयों से, विरोधों से। अतः अहंकार - आत्मचेतना आवश्यक है। यह अहंकार सभी महामानवों में वर्तमान रहा है, self - assertion के रूप में - बुद्ध में, ईसा में, तुलसी में, लेनिन में, गांधी में, नेहरू में, राम और कृष्ण में तो वह था ही । यदि नहीं होता तो वे लोग अपने सिद्धांतों का जोरदार प्रचार क्यों करते ? सभी मानव - प्रेमियों में वह रहा है ।
हां, मानव बन्धुओं के बीच सहयोग के लिए पूर्ण अहंकार का किंचित दमन श्रेय है, ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार एक संघ - शासन के बीच संयुक्त राज्यों के अहंकार का दमन । यह तो सर्वथा उचित है कि प्रत्येक अणु - अथवा प्रत्येक प्राणी - उस विराट सृष्टि की एक कड़ी है। यह विराट सृष्टि ही परमात्मा है।
संघर्ष और सहयोग - बुराई से संघर्ष और भलाई में सहयोग - मानव-कल्याण के लिए आवश्यक है। अहंकार की स्थिति और उसका नियमन ही श्रेय है।
43. सत्य - परायणों की मानसिक दशा
जो सत्य परायण होता है, वह कर्तव्य निष्ठ होता है, अपने उत्तरदायित्व को पूरा-पूरा संभालता है; इसका विचार रखता है कि उससे किसी दूसरे का अनिष्ट न हो जाए, अन्याय पूर्वक वह दूसरे का स्वत्व न हड़प ले, परपीड़न न करे, प्रत्येक दशा में औचित्य का निर्वाह करे। ऐसा मनुष्य लोक सेवक भी होता है, परोपकारी, महात्मा, नेता, हीरो, जननायक होता है।
इन महात्मा को लौकिक अभ्युदय प्रायः प्राप्त नहीं होता। वह प्रायः निर्धन, पीड़ित और स्वजनों द्वारा प्रताड़ित भी होते हैं, यदा-कदा उन्हें शहीद भी होना पड़ता है। तब एक ही लाभ का आश्वासन उन्हें दिया जाता है। क्या स्वर्ग का ? वह तो झूठ है। पुनर्जन्म में अच्छे सुख का? वह भी तो धोखा ही है। जो सबसे विश्वसनीय तर्कसंगत लाभ की आशा उन्हें हो सकती है वह है आत्म संतोष, मानसिक शांति।
पर एक भक्त कार्डिनल न्यूमैन अपनी Lead, Kindly Light कविता में कितने डरे और अशांत दिखाई पड़ते हैं ? Gloom उन्हें घेरे हुए है, Pride उनके will को rule करता है। गोस्वामी तुलसीदास 'संत सुभाव' गहने के लिए अधीर हैं। सूरदास घातक, कुटिल, चबाई, कपटी, महाक्रूर, संतापी आदि अपने को समझ कर दुखी हैं। ईसा चिल्ला उठते हैं: Father, Father, thou hast forsaken me !
यह निश्चय है कि उपर्युक्त सभी महात्मा मनुष्य जाति की शोभा थे, उनके सिरमौर थे। फिर भी उनका हृदय कितना अशांत था, अपने-आप के विषय में ही वह कितने चिंतित, कितने भयभीत थे। क्या किसी साधारण मनुष्य का जीवन इतना डरा होता है ? वह अनायास पाप-पुण्य करता है, खाता-पीता है, सोता है। पापी भी अपने बारे में निश्चिन्त रहता है।
महापुरुषों में मैंने दो को ही सर्वथा निश्चिन्त और आत्मविश्वस्त देखा - कबीर दास को और पंडित नेहरू को। स्वस्थ दृष्टिकोण था इनका। डट कर उचित करते थे और निश्चिन्त सोते थे। चिंता थी तो दूसरों की, दुनिया की।
44. My Spiritual Development
1. In my childhood and early manhood I was under Swami Dayananda's influence and believed that
a) The Vedas were eternal and perfect and contained absolute knowledge.
b) God was formless, had no images and was ever incarnated into human form.
c) Soul was immortal and took rebirth.
2. Later, under the influence of Gandhiji, Nehru ji and Marx, I came to believe that
a) the Vedas indicated only a milestone in the advancement of man's knowledge and man had advanced far ahead of them.
b) Knowledge, spirituality and material, as well as morals come from experience, and most countries apart from India had contributed to it.
c) India too had made much advancement in knowledge ahead of the Vedas ; Upanishads, Gita etc were further milestones in this advancement.
3. As a result of further thinking, I came to believe that the soul as well as the body was mortal and there was an end to both at death.
4. Under Ram Chandra shukla's influence, I further believed that God does not take forms, yet He can well be worshipped as Ram or Krishna. And it was India's great discovery that He was so worshipable.
That it was a sacrilege to claim to see Him in one's heart by Yogic exercises and in some mysterious way to radiate divine to others.
6. I believe that God cannot be seen as light or as Ram or Krishna and that images are lifeless and senseless. I believe in nothing supernatural except God.
7. Under Tulsi Das's influence, I believe that personal relations with God can be established.
45. पुनर्जन्म का सिद्धांत
पुनर्जन्म का सिद्धांत वर्तमान हिंदू धर्म की आधारशिला है। यह हिंदू धर्म का अनिवार्य अंग बना हुआ है। बौद्ध और जैन धर्म इसे मानते हैं। स्वामी दयानंद का आर्य धर्म भी इसे स्वीकार करता है।
इसके अनुसार प्रत्येक प्राणी को एक आत्मा होती है, जिसे जीवात्मा कहते हैं। वह अपने वर्तमान जीवन में जो कुछ भी करता है - भला या बुरा, उसके अनुसार उसका दूसरा जन्म होता है, जिसमें वह उस भले - बुरे कर्म का फल भोगता है। अतः मृत्यु जीवात्मा के जीवन का एक मोड़ - मात्र है, उसका अंत नहीं। जीवात्मा अमर है, उसका जीवन शाश्वत है; मृत्यु में केवल शरीर का अंत होता है, आत्मा पुराना शरीर छोड़ नया शरीर धारण करती है। मृत्यु आत्मा का कायाकल्प मात्र है। जन्म भी आत्मा के जीवन का आरंभ नहीं, एक नया मोड़ है। प्राणी का वर्तमान जीवन उसके पूर्व जन्म के कर्मों का परिणाम है। अतः पूर्वजन्म और परजन्म का अंतहीन चक्र चलता रहता है। प्रत्येक जीवात्मा को क्रमशः 84 लाख योनियों से होकर गुजरना पड़ता है, तब कहीं यदि माया से पूर्ण आसक्ति - जगत से पूर्ण विराग की अवस्था उसकी हो जाती है तो इसका निर्वाण या मोक्ष हो जाता है। स्वामी दयानंद तो मोक्ष को भी स्थाई नहीं मानते। उनके मत से एक नियत अवधि के बाद जीवात्मा का फिर जन्म होता है।
यह पुनर्जन्म का सिद्धांत पूर्ण रूप से कार्य-कारण सिद्धांत पर आधारित है। जो हम करते हैं, उसका फल मिलना अनिवार्य है। यदि इस जन्म में नहीं मिलता, तो अगले जन्म में अवश्य मिलना चाहिए। यह भी निश्चित है कि जो कुछ हम करते, सोचते या चाहते हैं, उसी के अनुसार हमारा व्यक्तित्व बनता है और मृत्यु के समय तक हम जो कुछ हो चुके होते हैं, अगले जन्म में हमें उसी का परिणामी रूप प्राप्त होना चाहिए। यह तर्क विरुद्ध जान पड़ता है कि मृत्यु के साथ उस पूर्ववर्ती कार्य-कारण श्रृंखला का उस चले आते जीवन - प्रवाह का सहसा अतर्क्य अंत हो जाए । अतः पुनर्जन्म का सिद्धांत तर्क - संगत जान पड़ता है।
मुसलमान और इसाई जीवात्मा के अमरत्व को तो स्वीकार करते हैं, पर पुनर्जन्म को बिल्कुल नहीं मानते। वे मनुष्य मात्र का एक ही जन्म स्वीकार करते हैं, जो मृत्यु के साथ समाप्त हो जाता है। उसके बाद एक दीर्घकालीन सुषुप्ति या निष्क्रियता की अवस्था आती है, जिसका अंत कयामत या प्रलय के दिन होता है, जबकि मनुष्य के भले - बुरे कर्म के अनुसार उसे स्वर्ग या नरक दिया जाता है। यह दीर्घकालीन सुषुप्ति किसलिए होती है और जीवात्मा अपने जन्म के पूर्व किस अवस्था में रहती है, इसका कोई समुचित उत्तर नहीं मिलता। इसके अतिरिक्त मनुष्येतर प्राणी में आत्मा होती है या नहीं, यदि होती है तो उसके मरने के बाद उसका क्या होता है, इसका उत्तर इन संप्रदायों में नहीं है। मनुष्य और इतर प्राणियों के बीच इस मौलिक अंतर का आधार बहुत ठोस नहीं मालूम होता। स्पष्ट है कि पुनर्जन्म का सिद्धांत अधिक तर्कसंगत, व्यापक और प्रश्न का सर्वांगीण समाधान प्रस्तुत करने वाला सिद्धांत है।
प्रश्न आध्यात्मिक नहीं, ऐहिक है। हमारा वर्तमान किसी पूर्व जीवन का परिणाम है कि नहीं, इस पर हमारे वर्तमान कर्तव्य का निर्णय बहुत कुछ निर्भर है। यदि हमारी वर्तमान दुरवस्था हमारे पूर्वजन्म के किन्हीं कर्मों का परिणाम है तो उसे हमें भोगना ही चाहिए, उसका प्रतिकार एक प्रकार का अनैतिक पलायन है। उसी प्रकार यदि कोई पूंजीपति मजदूर वर्ग का शोषण करता है तो इसका वह अपने पूर्व जन्म के कर्मों के अनुसार उसका भागी है और मजदूर शोषित होकर ही उस पूर्व जन्म के ऋण को चुका सकता है। अतः जो कुछ हम हैं, या जैसा कुछ यह समाज है, वह सब पूर्व निर्धारित है, नियति का कार्य है। शोषित अपने पूर्वजन्म के पापों का फल भोग रहा है, शोषक वर्ग अपने पूर्व जन्म के पुण्यों का सुख उठा रहा है और शोषितों से अपना बदला ले रहा है। वह नियति का एजेंट है। इस प्रकार कोई भी शोषक, लुटेरा, डाकू, अन्यायी बुरा नहीं है, वह नियति का कार्यकर्ता है।
इसलिए दलित या शोषित के लिए हड़ताल करना या पूंजीपति के विरुद्ध संघर्ष करना अनुचित जान पड़ता है। उसे संतोष पूर्वक अन्याय सहना चाहिए और यदि वह छुटकारा चाहता है तो अगली बार अच्छा जन्म पाने के लिए धर्म करना चाहिए,यद्यपि अपनी विपन्नावस्था में, जबकि उसे अन्न के ही लाले पड़े हुए हैं तो उसे धर्म का न ज्ञान है, न साधन। अतः पुनर्जन्म के सिद्धांत के अनुसार प्रत्येक अन्याय या शोषण, हत्या या उत्पीड़न न्यायोचित है और जैसा कि हमने अभी देखा है जो आज शोषित और दुखी है, वह भविष्य के भी किसी जन्म में सुखी नहीं हो सकेगा।
पुनर्जन्म के सिद्धांत की आज हिंदू धर्म में बड़ी मान्यता है। पर इस धर्म में भी सदा इसे यह गौरव प्राप्त नहीं था। वेद इस सिद्धांत से अपरिचित थे। उनमें पितृ लोक की कल्पना है, जहां मृत आत्माएं निवास करती हैं। उनकी तृप्ति के लिए ही पिंड दान आदि का विधान है। श्राद्ध का मेल पुनर्जन्म से नहीं बैठता। अतः पुनर्जन्म का विरोधी एकबारगी अहिन्दू नहीं कहा जा सकता।
अन्य मतों में - ईसाई और मुस्लिम मतों में - यह नहीं माना जाता, यह तो हम देख चुके हैं। प्राचीन यूनान वाले बड़े सभ्य थे, पर वे भी मृतात्मा के लिए पुनर्जन्म की नहीं, एलीसियम और टारटारस की कल्पना किए हुए हैं;जैसे उपनिषद काल के पूर्व हमारे यहां स्वर्ग और नरक की कल्पना की गई थी। मिस्र वाले भी अपनी मृत आत्माओं का पुनर्जन्म नहीं मानते थे, बल्कि किसी प्रेत लोक का ही अस्तित्व मानते थे, जिसमें उनकी सुविधा के लिए वे अन्न, वस्त्र पात्र, यहां तक कि दास और रानी तक की व्यवस्था करते थे। अतः पुनर्जन्म का सिद्धांत कोई व्यापक, सार्वभौम, सर्वमान्य सिद्धांत नहीं, जिसकी सच्चाई पर शंका ही नहीं की जा सके।
इस सिद्धांत को मानें तो कैसा अनर्थकारी निष्कर्ष निकलता है यह हम ऊपर देख चुके हैं। कुछ और बड़े विचित्र परिणाम भी इसे निकलते हैं।भाग्यवाद, जिसकी पराकाष्ठा नियतिवाद या determinism है, इसका एक अनिवार्य निष्कर्ष है। इसके अनुसार जो कुछ हम भोगते हैं, वह तो पूर्व निर्धारित है ही, जो कुछ हम करते, कहते और सोचते हैं; जो शरीर, रूप, रंग आदि हमने पाए हैं; जो कुछ हम बने हैं या बनेंगे, सब पूर्व निश्चित है। इतना ही नहीं, डॉक्टर की अवहेलना से अगर रोगी मर जाए , तो वह पूर्व निश्चित था क्योंकि वह इतनी ही आयु लेकर आया था। यदि डॉक्टर की तत्परता से वह जीवित हो जाए तो यह भी पूर्व निश्चित ही था। अतः डॉक्टर की अवहेलना या तत्परता कोई अर्थ नहीं रखती। कोई पागल अपनी सनक में यदि तीन-चार व्यक्तियों को मार दे तो उनकी आयु पूरी हो गई थी, इसलिए वे मारे गए। पागल तो एक निमित्त था, फिर उसे दंड क्यों दिया जाए? किसी महायुद्ध में यदि एक करोड़ आदमी मरें, तो इसका कारण उन सब की आयु का एक ही समय में समाप्त हो जाना है। यदि कीटनाशक औषधि से करोड़ो कीड़े क्षण भर में मार डाले जाए तो उनका मरना इसीलिए संभव है कि उनकी आयु समाप्त हो गई है।
श्री विनोबा भावे से कुछ लोगों ने पूछा कि भारत में वैज्ञानिक साधनों से जो मनुष्य की औसत आयु बढ़ गई है, वह उनके पूर्व जन्म के कर्मों से निर्धारित आयु से अधिक कैसे हो गई; तो उन्होंने उत्तर दिया कि अब वे ही लोग जन्म लेते हैं जिनकी पूर्व जन्म के कर्मों के अनुसार आयु लंबी है। मुझे कहना पड़ेगा कि विनोबा जी का यह कथन घोर अंधविश्वास है जिसका कोई प्रमाण नहीं। ऐसी बात कम शिक्षित समाज में भी बिरले ही सुनने को मिलती है। फिर भी, यदि पुनर्जन्म का सिद्धांत सच है, तो उसे मनाना ही पड़ेगा।
अब सोचने की बात है कि मनुष्य का जन्म ही कैसे होता है और कैसे किसी मृत प्राणी की आत्मा उसके शरीर में प्रवेश करती है। हम माता के गर्भ से जन्म लेते हैं; और वहां हमारी अवस्था कभी भी ऐसी नहीं रहती, जब हम निष्प्राण हों और कोई आत्मा हमारे निष्प्राण शरीर में कहीं बाहर से आती हो। यह धारणा कि गर्भ के पिंड में प्राण चौथे या पांचवें मास में आते हैं, सर्वथा गलत है। चौथे - पांचवें मास तक भी वह पिंड लगातार बढ़ता रहा होता है, जो बिना प्राण के होना असंभव है। वह जीवित तो उसी समय रहता है जब पिता के शरीर से शुक्र के रूप में मां के गर्भ में आता है। माँ के गर्भ में जो आता है वह एक जीवाणु है, एक जीवित व्यक्ति है - पुरुष या स्त्री - जो अनुकूल स्थान, भोजन, ताप आदि पाकर स्थूल शरीर प्राप्त कर लेता है। वह जीवाणु के रूप में अपने पिता के शरीर में अपने असंख्य भाई - बहनों के साथ पहले से ही रहता है। वहां भी वह कहीं बाहर से नहीं आता, वहीं उत्पन्न होता है, जो उनकी स्वस्थता, पौरुष आदि का परिणाम है। वह शरीर की उपज है, उनके भोजन के पचने का परिणाम।
हम जो कुछ भी खाते हैं, वह कई जीवित इकाइयों का समूह है। सैकड़ों चने, चावल के दाने, आलू आदि हम खाते हैं, जिनमें से प्रत्येक वैसे ही सैकड़ों दाने - जीवित इकाइयां - उत्पन्न कर सकता है। खाने के क्रम में हम उन्हें मार डालते हैं, अतः उनमें यदि आत्माएं होंगी, तो बाहर निकल जाती होंगी। वे आत्माएं हमारे शरीर में जीवाणु रूप में नहीं रहती होंगी। वे दाने हमारा शरीर निर्माण करते हैं और हमारा शरीर फिर से नए जीवाणु उत्पन्न करता है। ये ही जीवाणु नए व्यक्तियों के रूप में जन्म लेते हैं। अतः नए व्यक्तियों के जन्म का कारण पिता का स्वस्थ शरीर है, उनकी आत्माओं का स्रोत नहीं है, वे कहीं बाहर से नहीं आतीं।
पुनर्जन्म में विश्वास करने वालों के लिए यह बात नई मालूम हो सकती है, पर है नहीं। प्रत्येक बीज, जो पृथ्वी में बोया जाता है,एक जीवित इकाई है, जो अनेक फलों को उत्पन्न करता है। अतः इन फलों की आत्माएं उस बीज से ही नि:सृत होती हैं, बाहर से नहीं। एक वट वृक्ष की अनेक डालें भूमि का स्पर्श कर नए वृक्ष बन जाती हैं। क्या उनमें जीवन बाहर से आता है? उनके शरीर के साथ ही वह उस मूल वृक्ष से ही आता है। यही बात सभी प्राणियों के साथ है। पिता का जीवन ही सभी संतानों के जीवन का एकमात्र स्रोत है; बाहर से किसी जीवन का प्रवेश किसी भी शरीर में नहीं होता। इसी प्रकार शरीर के अंत के साथ कोई आत्मा बाहर नहीं निकलती, शरीर के साथ ही उसका भी अंत हो जाता है, अग्नि बुझ जाती है।
वास्तव में जीवात्मा कोई वस्तु नहीं, जीवन एक वस्तु है जो शरीर की सक्रियता का नाम है। वह उपयुक्त भोजन (अन्न, जल, वायु, प्रकाश, ताप) आदि पर निर्भर है, जिसकी अपर्याप्तता से वह क्षीण होता है और जिसके अभाव में वह नष्ट हो जाता है। शरीर की शक्ति का शून्य होना ही मृत्यु है।
यदि जीवित मनुष्य के सहसा दो टुकड़े कर दिए जाएं तो दोनों कुछ देर गतिशील रहेंगे। यदि छिपकिली की पूंछ काट दी जाए तो छिपकिली तो जीवित रहती ही है, उसकी पूंछ भी अलग कुछ देर छटपटाती है अर्थात वह भी कुछ देर जीवित रहती है। अतः सिद्ध होता है कि प्राण विभाज्य है, आत्मा की कोई अविभाज्य अखंड सत्ता नहीं। इसी प्रकार यदि मनुष्य की रक्त वाहक नाड़ी काट दी जाए, तो उसके प्राण उसी नाड़ी के रक्त - प्रवाह के साथ क्रमशः निकलेंगे; आत्मा रहती तो एकबारगी निकलती। ऐसे मनुष्य के प्राण क्रमशः क्षीण होते जाते हैं, शरीर शिथिल होता जाता है, चेतना लुप्त होती जाती है और अंततः वह निष्प्राण हो जाता है। यदि इसके पहले नाड़ी का रक्त प्रवाह बंद कर दिया जाए और नवीन रक्त दिया जाए, तो मनुष्य बच भी सकता है। अतः रक्त ही जीवन है, वही प्राण है; आत्मा कुछ नहीं। न उसकी अविभाज्य सत्ता है, न वह कहीं से आती है, न कहीं जाती है । वह शरीर का अंग है जो उसके साथ ही जन्म लेती है और साथ ही मरती है।
अतः पूर्वजन्म अथवा पुनर्जन्म का कोई अस्तित्व नहीं। आत्मा का ही कोई अस्तित्व नहीं। हमारी परंपरा 84 लाख योनियों में स्थित नहीं है। वह हमारी वंशावली में सुरक्षित है। हम अपने पिता के आत्मज हैं ; हम पूर्वजों से आए हैं और वंशजों में विलीन होंगे। हम पर 84 लाख योनियों के संस्कार नहीं हैं, पूर्वजों के संस्कार हैं। हम किसी पूर्व जीवन के कर्मों का फल नहीं भोगते, वर्तमान जीवन की स्थितियों – अपने वातावरण, अपने कर्म, अपने परिवार और समाज की अच्छाइयों-बुराइयों– के फलाफल भोगते हैं। हम अपनी स्थिति को व्यक्तिगत, पारिवारिक और सामाजिक प्रयास से सुधार सकते हैं।
अतः मृत्यु सुषुप्ति है, विश्राम है जीवन की कशमकश की, और चिर शांति है तनाव की । स्वर्ग, नरक, पितृ लोक, प्रेत लोक, सुप्ति लोक का अस्तित्व नहीं। मृत्यु भय की वस्तु नहीं। हमें मरने के बाद वैतरणी लांघने और कड़ी धूप से जलती करोड़ों कोस की छाया विहीन राह से, भूख और प्यास से विकल, यात्रा करने का कोई भय नहीं। मृत्यु के उपरांत हम सारे कष्टों, क्लेशों, चेतनाओं, स्पंदनों और अनुभूतियों से मुक्त हैं। मृत्यु मुक्ति है।
46. जीवन और ईश्वर
पूर्वजन्म या पुनर्जन्म नहीं होता है। स्वर्ग और नर्क भी नहीं है। स्वर्ग यदि नहीं है तो कुछ बुरा नहीं, क्योंकि उसी के हिमायतियों के अनुसार वहां का जीवन स्थिर (static), नीरस (monotonous), विकास- रहित, उद्देश्य- रहित और इसलिए अर्थ - रहित है। वह हमें नहीं चाहिए । हमारा इह-जीवन ही सब कुछ है। यही हमारी लीला- काल और यह जगत ही हमारा एक मात्र लीला - क्षेत्र है। इसे ही हमें आनंदमय बनाना चाहिए।
एक बात निश्चित है कि यह जीवन हमारे दुर्भाग्य का प्रतीक नहीं है। यह बात नहीं है कि हम किसी भव-बंधन में आकर पड़ गए हैं, और उससे छूटना हमारा चरम लक्ष्य होना चाहिए। छूटेंगे तो हम अनायास, मृत्यु आकर स्वयं छुड़ा लेगी। हमें इससे छूटने का प्रयत्न नहीं करना है। हमें इसे जीना है।
और जीवन वैसा कुछ दु:खमय भी नहीं है, यदि भलीभांति जीवन-यापन किया जाए। यदि हम अपना कर्तव्य - पालन करें और उसका फल कोई हमसे न छीने, तो प्रकृति इतनी उदार है कि हमारी सारी आवश्यकताएं पूरी हों और हम दूसरों की सेवा में भी अपने को लगा सकें। जीवन आनंदमय और सोद्देश्य हो। जीवन जीने योग्य हो जाए और हमें इसे कोसना न पड़े और इससे छूटने के लिए प्रयत्न करना न पड़े।
हमारी इसी दुनिया में, पृथ्वी के ऊपर मखमली हरियाली है, जो आंखों को तृप्त करती और मन को हरती है ; वृक्ष हैं, जिनमें विभिन्न आकृतियों की पत्तियां है ; रंग-बिरंगे फूल हैं; सूरज की सुनहरी किरणें हैं, चांद की दूधिया चांदनी है। कल्लोलिनी नदियां है; विशाल गगन-चुंबी पर्वत हैं । सांस लेने के लिए वायु है, पीने के लिए जल, भोजन के लिए अन्न, फल, दूध, मधु, मेवे आदि । प्यार करने के लिए परिवार, सख्य के लिए संसार, मनोरंजन के लिए अनेक पशु-पक्षी। ये सभी इसी जीवन में प्राप्य हैं ।
अतः यह जीवन पलायन-योग्य नहीं है। बुद्ध कहते हैं, जन्म दु:खमय है, बुढ़ापा दु:खमय है, मृत्यु दु:खमय है, रोग दु:खमय है ; इसलिए इस जीवन से मुक्ति पाना ही चरम सुख है। स्वर्ग और मुक्ति की असारता और अनस्तित्वता पर हम विचार कर चुके हैं। जिस जन्म को दु:खमय कहा जाता है, वह परिवार और जाति के लिए कितने मंगल का सूचक है। कितने उत्साह और आह्लाद का जनक है। किस संगीत और बधावे के साथ उसका स्वागत होता है। किसी को भी पता नहीं कि भ्रूण को क्या कष्ट होता है, पर यह निश्चित है कि यदि उसे बहुत कष्ट होता तो वह नन्हा-सा जीव नौ मास तक कभी बच नहीं पाता। बुढ़ापा अशक्त तो है, पर यदि बच्चे और समाज नालायक न हो, तो वह दु:खदाई नहीं हो सकता। अपने अनुभव, बुद्धि और सूझ के कारण वृद्ध कितने सम्मान का अधिकारी होता है। मृत्यु में भी क्या दु:ख है, यह किसी को नहीं मालूम, पर उसमें जो दु:ख है वह असह्य है, ऐसा हम नहीं जानते। पर उसमें जो भी दु:ख है वह क्षणिक है और चिर-विश्रांति, मुक्ति का अग्र-सूचक।
दु:ख की वस्तु रोग है, पर वह छूटता है; और यदि हम और समाज उचित ढंग से रहें, तो वह हो भी नहीं।
पर जीवन आज जैसा है, वह तो दु:खमय है। कहीं-कहीं वह भयानक है, कहीं वीभत्स, कहीं अपमानजनक, कहीं अनंत रुदन से सिक्त। वर्तमान जीवन जितना शुभ नहीं, उतना अशुभ है। यह जीवन जीना है तो उसे शुभ बनाना होगा, क्योंकि पलायन में, मृत्यु में, परलोक में, मोक्ष में सुख नहीं है, केवल अनस्तित्व है। अतः इस जीवन को सुखी बनाना होगा, इसके दोष मिटाने होंगे।
ईमानदार विचारकों ने माना है कि जीवन सर्वथा सुखमय हो सकता है। वाल्मीकि ने राम-राज्य को प्रमाणित किया है या कम से कम उसकी कल्पना की है। राम राज्य इसी दुनिया, इसी जीवन की चीज है। वह स्वर्ग या परलोक में उपलब्ध नहीं हुआ था। प्लेटो ने भी अपने ' रिपब्लिक ' में एक सुखमय समाज को ही उपलब्ध करने की चेष्टा की है, सुखमय स्वर्ग की नहीं। कार्ल मार्क्स ने अपने समाजवाद द्वारा एक सुखमय संसार में सुखी जीवन की उपलब्धि का ही मार्ग निर्देश किया है।
अतः हम किसी असंभव कल्पना में प्रवृत नहीं हो रहे हैं। हम यह प्रश्न उठा रहे हैं कि जीवन सर्वथा सुखमय कैसे होगा ? अवश्य ही वह धर्म द्वारा होगा। धर्म द्वारा मोक्ष या स्वर्ग नहीं मिलेगा, यह तो ज्ञात है। धर्म द्वारा यह दुनिया सुखमय होगी, यह जीवन सुखमय होगा। हम धर्म करके अपना परलोक नहीं बनाएंगे, हम अपना पुनर्जन्म नहीं सुधारेंगे - वे तो होते ही नहीं। हम अपना समाज सुधारने में योग देंगे; हम इस दुनिया को अधिक सुखद बनाएंगे, जिससे इसमें जीने वाला समुदाय - हमारा समाज और हमारी संतति - सुखी होगी; और उस सुख का अपना भाग हमें भी मिलेगा।
बस, धर्म का यही फल है। जो चाहते हैं और आशा करते हैं कि जितना धर्म हम करते हैं, उसका पूरा फल हमें इहलोक या परलोक में मिलेगा, वे भ्रम में हैं। पूरा फल तो मिलेगा ही, रत्ती भर कम नहीं मिलेगा; पर वह समुदाय का हो जाएगा, हमें उसका अंश-मात्र ही मिलेगा। यह भी हो सकता है कि दूसरे सब लूट लें और हमें कुछ भी न मिले। यहां तक हो सकता है कि हमें केवल त्याग और कष्ट ही मिले, सारा सुख समुदाय या उसका कोई विशिष्ट अंग ले ले।
जैसे, स्वराज्य - प्राप्ति से उपार्जित कोई सुख गांधी जी को नहीं मिला। पर जो जीवित रहे, उन्हें स्वतंत्रता-सेनानी पेंशन मिली, स्वतंत्र भारत की नागरिकता और स्वतंत्रता के बाद की समृद्धि का कुछ अंश अवश्य मिला। उनका त्याग उनके प्राप्य से भले ही अधिक रहा हो।
यदि हमारा त्याग हमारे प्राप्य से अधिक होता है, तो फिर हम धर्म क्यों करें ? हम धर्म इसलिए करें कि हमारा अतिरिक्त त्याग ही इस दुनिया को, इस जीवन को, सुधारने का एकमात्र उपाय है। अतः हमें त्याग और बलिदान करने ही होंगे। हमारे जीवन काल में यदि पूर्ण सुधार हो जाएगा, तो हमारा जीवन भी पूर्ण सुखमय होगा। पर यदि हम त्याग नहीं करेंगे, तो जीवन नहीं सुधरेगा, दु:खी जीवन का कोढ़ हमें नहीं छोड़ेगा, और हम स्वर्ग, परलोक और मोक्ष के भूल- भुलैये में शरण लेने को बाध्य होंगे।
धर्म क्या है ? कणाद ने कहा कि जिससे अभ्युदय और नि:श्रेयस की सिद्धि हो, वही धर्म है। किसी और ने कहा, जो धारण करे, वह धर्म है। हैरोल्ड लास्की कहते हैं: Good is either social or not good at all. 'Good' का अर्थ 'कल्याण' है,
पर मैं इसे 'धर्म' के अर्थ में ही लेता हूं क्योंकि धर्म कारण है और कल्याण कार्य ; इसलिए धर्म प्रच्छन्न कल्याण है और कल्याण प्रत्यक्ष धर्म। धर्म और कल्याण अविच्छिन्न हैं। यूं भी, धर्म समस्त अच्छाई का संघटित रूप है।
धर्म की व्याख्या करने के पहले यह स्वयं सिद्धि की भांति मान लेना होगा कि व्यक्तिगत पूजा-पाठ, तीर्थ-व्रत, भगवद-भक्ति सामाजिक अर्थ में धर्म नहीं हैं ; और यदि धर्म सामाजिक कल्याण का ही संघटित रूप है तो वे धर्म ही नहीं हैं। उनका महत्व यदि कुछ है तो व्यक्तिगत है।
पर इसके विपरीत नाली साफ करना, सड़क पर ना थूकना, टीका लगाना जैसे छोटे काम धर्म हैं, क्योंकि इनसे समाज का कल्याण होता है।
अतः धर्म वह है जिससे कल्याण हो, और जैसा हैरोल्ड लास्की ने कहा है, कल्याण या तो सामाजिक होता है, या वह होता ही नहीं। दूसरे शब्दों में सामाजिक कल्याण ही कल्याण है। वह व्यक्तिक अभ्युदय, जिससे कल्याण की क्षति होती है, अकल्याण है; जहां ऐसी क्षति नहीं होती, वहां उसे कल्याण मान सकते हैं। इसलिए जो व्यक्ति समाज का शोषण करके करोड़पति बनता है, वह अधर्मी है। इस बात को यहां तक खींच सकते हैं, कि जो व्यक्ति दूसरे के उचित अधिकार का अपहरण करके अपना अभ्युदय करता है, वह पापी है।
कणाद ने अभ्युदय में धर्म माना है। अभ्युदय अपनी सांसारिक उन्नति को कहते हैं। उपर्युक्त मान्यता के अनुसार वह अभ्युदय धर्म नहीं है, जो दूसरे के शोषण पर आश्रित है। अपने शुद्ध परिश्रम और प्रतिभा के द्वारा यदि अपना अभ्युदय किया जाए - धन, वैभव, योग्यता, सत्ता बढ़ाई जाए, तो वह स्व-उपार्जित अभ्युदय धर्म है। पर अपने अभ्युदय में दूसरे का सहयोग और सहायता अपेक्षित होती है। ऐसी अवस्था में उसे दूसरे का प्राप्य उसे पूर्णत: देकर ही अपना अभ्युदय करना धर्म होगा। हैरोल्ड लास्की भी शायद इसे धर्म मानेंगे क्योंकि इस प्रकार का अभ्युदय अंततः समाज के उपयोग में ही आता है।
कणाद ने धर्म का दूसरा लक्षण नि:श्रेयस की सिद्धि माना है। नि:श्रेयस का अर्थ है मोक्ष। मोक्ष परलोकवादियों की दृष्टि में आत्मोन्नयन द्वारा; लोक सेवा, निस्पृहता ,स्थितप्रज्ञता द्वारा; प्राप्त होता है। हम ऊपर परलोकवाद का खंडन कर आए हैं। इसलिए हम नि:श्रेयस सिद्धि का अर्थ कल्याण सिद्धि ही लेंगे। अतः धर्म का दूसरा लक्षण लोकोपकार, समाज-कल्याण हुआ। संक्षेप में कहें, तो धर्म वह है, जो आत्म-कल्याण और लोक - कल्याण का साधक हो।
संपूर्ण पुराणों का तथ्य निम्नलिखित शब्दों में समाहित कर लिया गया है:
अष्टादश पुराणेषु व्यासस्य वचनद्वयम् ।
परोपकारः पुण्याय पापाय परपीडनम् ॥
यह मत तुलसीदास का भी है
परहित सरिस धर्म नहीं भाई।
परपीड़ा सम नहिं अधमाई।।
निष्कर्षतः, यदि हम कोई ऐसा काम न करें, जिससे दूसरे का या समाज का अकल्याण हो; हम अपना कल्याण करते हुए समाज का भी कल्याण करते चलें; और हम अपने हित का लोक कल्याण के हित में त्याग करते चलें, तो हम धर्मात्मा हैं।
स्पष्ट है कि ऐसे धर्म की साधना से शोषण बंद होगा। शोषण बंद होने से संसार का वर्तमान वैभव सभी के बीच समानता के आधार पर बट जाएगा। बहुत-सी गरीबी, बीमारी, दु:ख, पीड़ा मिट जाएगी। बुढ़ापा कम दुखद होगा। जो दु:ख रह जाएगा, वह मनुष्य जाति के वर्तमान सामर्थ्य की सीमितता के कारण रहेगा। पर अपने साधनों का अधिक से अधिक उपयोग करता हुआ मानव क्षण- क्षण अपनी सामर्थ्य बढाता जाएगा, और शेष दुख भी मिटते जाएंगे। दुनिया आधिकाधिक संपन्न और समृद्ध होती जाएगी और उसका लाभ हर मानव को मिलता जाएगा।
अतः जीवन के लिए धर्म पहली शर्त है। इसीलिए कहा गया है कि 'धारयति इति धर्म,' जो धारण करें वही धर्म है। धर्म ही इस संसार को धारण किए हुए है। जितना धर्म अभी इस संसार में है, उतना ही सुख है; जो दु:ख है, वह अधर्म के कारण है। यदि धर्म नहीं रहे तो दुनिया चले ही नहीं। जितना वह चलती है, वह इसीलिए कि कुछ धर्म अभी शेष है। अतः धर्म हमारी जीवन - प्रणाली होनी चाहिए।
इस प्रकार की जीवन - प्रणाली शुद्ध लौकिक दृष्टि से अनिवार्य सिद्ध हुई है। धर्म की आवश्यकता ऐहिक है। अध्यात्म का उसमें कोई स्थान नहीं। चूंकि ईश्वर (या उसके संबंध में हमारी धारणा) धर्म- स्वरूप है, इसलिए उससे हमारा संबंध इसी धर्म की प्रेरणा को लेकर है। वह धर्म-स्वरूप है, इसलिए वह हमें धर्म-बुद्धि दे सकता है, हमारी धर्म साधना में सहायक हो सकता है। वह सर्वशक्तिमान है, इसलिए हमारी और मानव जाति की - और मानवेतर जगत की भी - बाधाओं को दूर कर सकता है। हमारा- उसका संबंध इसी जन्म के लिए है, जन्म-जन्म के लिए नहीं। पर इस जन्म के लिए ही वह अटूट है।
47. कुछ प्रश्नों पर विचार (1968)
1. कश्मीर को जनमत गणना की शर्त पर भारत में
क्यों शामिल किया गया? अन्य राज्यों के साथ
ऐसी शर्त क्यों नहीं लगाई गई? क्या नेहरू जी
द्विराष्ट्र सिद्धांत को मानते थे ?
किसी वृहत क्षेत्र की जनता को उसकी इच्छा के विरुद्ध केवल उसके राजा की इच्छा से किसी देश में शामिल करना अनुचित है। यह प्रजातांत्रिक सिद्धांत के विरुद्ध है। जनता मूक पशु नहीं है। इसलिए कश्मीर के राजा और उसके नेशनल कांफ्रेंस की सहमति के बावजूद भी प्रजा की सहमति आवश्यक समझी गई।
अन्य राज्यों के साथ ऐसी शर्त इसलिए नहीं लगाई गई कि वे भारत के भौगोलिक क्षेत्र के अंग थे। कश्मीर वैसा नहीं था। यह भी कारण था कि उसकी बहुसंख्यक आबादी मुस्लिम थी।
नेहरू जी द्विराष्ट्र सिद्धांत के प्रबल विरोधी थे। पर कश्मीर के निकटवर्ती क्षेत्रों में इस विषय पर मतगणना हुई थी, इसलिए उन्होंने कश्मीर में मतगणना स्वीकार की। और फिर वह किसी अनिच्छुक जन समूह को भारतीय संघ में शामिल करने के विरुद्ध थे।
2. कश्मीर समस्या को यूएनओ में क्यों दिया गया?
गांधी जी ने इसे गलत क्यों बताया?
कश्मीर की समस्या भारत की घरेलू समस्या नहीं थी। उसका भारत में सम्मिलन शर्त के साथ हुआ था। इसलिए कश्मीर का प्रश्न अन्तर्राष्ट्रीय प्रश्न था, जिसका निपटारा अंतरराष्ट्रीय संस्था द्वारा होना ही उचित था। कश्मीर में आक्रमण की स्थिति थी। अतः इस स्थिति को यूएनओ में देना ही उचित था।
वैसे, किसी भी आक्रमण को, अपने देश के ऊपर आक्रमण को भी, विश्व संस्था में ले जाना आवश्यक है । विश्व संस्था इसीलिए है। जैसे व्यक्ति के लिए कानून अपने हाथ में लेना वर्जित है, वैसे राज्य के लिए भी।
कश्मीर के संबंध में स्थिति यह थी 'क' के ऊपर 'ख' ने आक्रमण किया। 'ग' ने न्याय बुद्धि से प्रेरित होकर 'ख' को रोका और सरकार को खबर दी। इसमें गलती कहां है?
गांधी जी ने इसे अनुचित नहीं, अव्यावहारिक कहा था। वे यूनओ की स्वार्थपरता को जानते थे, उसके न्याय में उन्हें विश्वास नहीं था। नेहरू जी अंतर्राष्ट्रीय अशांति के शमन के लिए यूनओ जैसी संस्था को मजबूत बनाना चाहते थे। वह एक सरकार के रहनुमा थे। गांधी जी एक व्यक्ति थे। अंतरराष्ट्रीय मामलों में एक सरकार की जिम्मेदारी व्यक्ति की जिम्मेदारी से अधिक होती है।
3. कश्मीर में भारतीय सेना की विजय यात्रा सहसा
क्यों रोक दी गई? यदि पूरा कश्मीर हाथ में आ
जाता तो समस्या सदा के लिए हल हो जाती।
भारत सरकार का उद्देश्य केवल कश्मीर की जनता को पश्चिमी लुटेरों से उद्धार करना था। अतः जब कश्मीर घाटी से ये लुटेरे निकल गए, कश्मीर का राज्य सुरक्षित हो गया, तब युद्ध रोक दिया गया और मामला यूनओ को दे दिया गया। पूरा कश्मीर जीत लेने पर भी समस्या हल नहीं होती। पाकिस्तान इसे ए यूएनओ में ले जाता, जैसा उसने हैदराबाद के संबंध में किया और तब हमारा पक्ष इसे कमजोर होता ।
4. आजादी के बाद गांधी जी कांग्रेस का विघटन
चाहते थे। नेहरू जी ने इसे क्यों नहीं किया?
केवल नेहरू जी ने ही नहीं, सरदार पटेल ने, राजेंद्र बाबू ने भी उसे नहीं किया। 1962 के अंत में भी राजेंद्र बाबू कांग्रेस में सम्मिलित होने के इच्छुक थे, उसी कांग्रेस जिसके सर्वेसर्वा नेहरू जी थे। कांग्रेस केवल आजादी के लिए लड़ने वाली संस्था ही नहीं थी, उसकी एक सुविचारित आर्थिक, राजनीतिक, अंतर्राष्ट्रीय नीति थी। इस नीति को स्वाधीन भारत में चालित करना था। इसमें कांग्रेस का संगठन सहायक होता । नेहरू जी ने एक संगठित दल को विघटित करके देश को दल रहित कर देना ठीक नहीं समझा। ऐसा होने पर संसदीय शासन नहीं चलता। देश में एक राजनीतिक शून्यता की स्थिति हो जाती। अपरिपक्व दलबंदिया चलती। जैसा हम देखते हैं आज तक कांग्रेस के अलावा कोई अखिल भारतीय स्थाई दल नहीं बन पाया है।
5. नेहरू जी ने भारत का विभाजन क्यों स्वीकार
किया?
भारत का विभाजन नेहरू जी के भी पहले सरदार पटेल ने स्वीकार किया। यह लाचारी में स्वीकार किया गया। कोई राष्ट्रवादी भारतीय, कोई कांग्रेसी इसे नहीं चाहता था। यह वर्षों के विरोध और असहमति के बाद स्वीकार किया गया। कोई विस्तृत भूखंड उसके निवासियों की इच्छा के विरुद्ध किसी राज्य का अंग नहीं बनाया जा सकता। गांधी जी ने भी ऐसा कहा था। इस स्थिति में इसे स्वीकार किया गया और सारी कांग्रेस ने इसे स्वीकार किया। गांधी जी ने कांग्रेस को इसे स्वीकार करने की सलाह दी।
यह भी असंदिग्ध रूप से नहीं कहा जा सकता कि अविभाजित भारत, मुस्लिम लीग जैसी संस्थाओं और जिन्ना जैसे नेताओं के रहते, वर्तमान विभाजित भारत से अच्छा होता।वर्तमान भारत में जिस अप्रतिहत गति और एकनिष्ठता के साथ विकास कार्य हुआ,वैसा तब कभी न होता । पाकिस्तान की दुर्दशा हम देख रहे हैं। ऐसे बिगड़े अंग को लेकर हम बराबर उलझन में ही रहते।
6. नेहरूजी ने कश्मीर में जनमत लेने से फिर
इंकार क्यों किया?
ऐसा इसलिए कि यह जनमत संपूर्ण कश्मीर में ही होता और इसकी शर्त थी कि पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर से पहले हटे। कश्मीर चूंकि वैध रूप से भारत से मिल चुका था, इसलिए मतगणना होने तक संपूर्ण कश्मीर को भारत के अधीन रहना था। मतगणना यूएनओ के तत्वावधान में होने को थी। पर पाकिस्तान अधिकृत क्षेत्र से हटा ही नहीं। 1954 तक श्री नेहरू ने इसकी प्रतीक्षा की। तब उन्होंने मतगणना से इनकार किया। आखिर कश्मीर में आदमी बसते हैं। उनका भाग्य अनिर्दिष्ट काल तक अधर में लटका नहीं रह सकता है। उनके जीने, विकास करने आदि की आवश्यकता है। अतः उसका कुछ फैसला करना था। नेहरू जी ने अधिकृत कश्मीर को पाकिस्तान के हाथ में छोड़ शेष को स्थाई रूप से भारत के अधीन घोषित कर दिया। वयस्क मताधिकार के आधार पर वहां संविधान परिषद निर्वाचित कराई, जिसने कश्मीर का संविधान बनाया। उसी के आधार पर वहां की सरकार बनी और विकास का कार्य चला। उसके प्रधानमंत्री वहां के लोकप्रिय नेता शेख अब्दुल्ला बने।
7. नेहरू जी ने सेना को काफी सबल क्यों नहीं
बनाया, जिससे चीन से हमारी हार हुई?
सेना पर अधिक खर्च कांग्रेस को सदा से नामंजूर था। ब्रिटिश काल में इसका घोर विरोध किया जाता था और गरीब भारतीयों को इसका खर्च ढोने में असमर्थ बताया जाता था। गांधी जी महान अहिंसावादी थे ही। कांग्रेस भी कहती थी कि हमें किसी देश से बैर नहीं, इसलिए कोई खतरा नहीं, हम सेना पर खर्च कम करेंगे और विकास पर अधिक। नेहरू जी महान युद्ध विरोधी और जनता प्रेमी थे ।युद्ध को अनुत्पादक और संहारक वस्तु समझते थे और उसके लिए धन खर्च करना उसका अपव्यय समझते थे। वे जनता का आर्थिक स्तर ऊंचा करने के लिए अधीर थे।
1962 के बाद सेना पर ध्यान दिया गया और अधिक खर्च किया जाने लगा। फल हुआ आर्थिक ह्रास, योजनाएं ठप्प और दिवाला।
8. चीन पर नेहरू जी ने विश्वास क्यों किया, जो कि
दुश्मन था?
चीन पहले से दुश्मन नहीं था। वह भाई बना हुआ था। नेहरू जी ने उससे मैत्री करके महान राजनीतिज्ञता का परिचय दिया था। इतने बड़े देश से बैर नहीं ठाना जा सकता था। इससे उसका या अपना, संभवत: अपना ही विनाश हो सकता था। नेहरू जी ने उसे पंचशील की राह पर चलाने की कोशिश की। वह नहीं चला , तो उनका क्या दोष ?
48. जवाहरलाल नेहरू: कृतित्व, 1967
पं. जवाहरलाल नेहरू ने भारतीय आजादी की लड़ाई लड़ी थी। महात्मा गांधी के नेतृत्व में उन्होंने बार-बार ब्रिटिश साम्राज्यवाद को ललकारा था। अन्य महान नेताओं के लिए - सरदार पटेल और डॉ राजेंद्र प्रसाद तथा महात्मा गांधी तक के लिए युद्ध-विराम होते थे, सांस लेने के अवकाश होते थे, पर नेहरू जी के लिए नहीं। 1930 के बाद से नेहरू जी की वाणी, उनके कर्म, उनका मन ब्रिटिश साम्राज्यवाद से लगातार लोहा लेता रहा था; तब से 15 अगस्त 1947 तक उनका व्यक्तित्व उस साम्राज्य के विरुद्ध सतत युद्ध का निरंतर उद्घोष था। इसलिए 1932 में, फिर 1934 में, फिर 1940 में, फिर 1942 में वे बार-बार लंबी जेल- यात्राओं में गए। जब छूटे तो थोड़े दिनों के लिए,और चाहे कांग्रेस ने विराम-संधि कर ली हो, नेहरू युद्ध-रत रहे; उन दिनों भी वे सदा आक्रमणशील रहे। 1936 में कांग्रेस की बागडोर संभालते ही उन्होंने उसमें नए प्राण फूंक दिए और परिणाम हुआ 1937 की चुनाव-विजय। 1945 में जेल से निकलते ही उन्होंने पिटी कांग्रेस और पिटे भारत को एकबारगी आक्रांत बना दिया। "जनता ने जो कुछ किया है, उसकी पूरी जिम्मेदारी मुझ पर है और मुझे उसका गर्व है, राष्ट्रीय तिरंगा लाल किले पर फहराएगा; जिन्होंने जनता पर जुल्म ढाए और ज्यादतियां की हैं, उन पर मुकदमे किए जाएंगे और वे दंडित होंगे "- यह थे आजादी के पहले उनके सिंह-गर्जन। कोई अवसर नहीं गया,जब उन्होंने ब्रिटिश साम्राज्यवाद को, साम्राज्य को और अधिकारियों को नहीं ललकारा। आई.एन.ए. के सदस्यों को कोर्ट- मार्शल से बचाने में उनका स्वर सबसे ऊंचा था।
वे भारत के एकमात्र नेता थे, जिन्होंने अंतर्राष्ट्रीयतावाद का नारा लगाया; जिन्होंने मिस्र, चीन, जैकोस्लोवाकिया, स्पेन और रूस के युद्ध को अपना युद्ध माना; जिन्होंने मुसोलिनी, हिटलर और तोजो को अपना विपक्षी माना; उपनिवेशवाद, नाजीवाद, फासिस्टवाद और सैन्यवाद के विरुद्ध जिनका स्वर संसार भर में सबसे ऊंचा था, जिनका संघर्ष एक साथ ही ब्रिटिश साम्राज्यवाद, हिटलरी नाजीवाद, फ्रेंच उपनिवेशवाद, डच उपनिवेशवाद, इटालियन फासिस्टवाद और जापानी सैनिकवाद से था और जो समस्त दलित मानवता की ओर से बोलने वाले एकमात्र प्राणी थे।
इसलिए समस्त भारतीय उन्हें अपने गौरव का साकार रूप मानते थे, जनता उन्हें अपना भाई और अपनी आशाओं का केंद्र मानती थी। उसने उन्हें जो प्यार दिया, वह इतिहास में किसी दूसरे को नहीं मिला। जनता उनके पीछे पागलों की तरह दौड़ती थी, दस-दस लाख की संख्या में इकट्ठी होती थी।
भारतीय और विश्व इतिहास को उन्होंने छान डाला। विश्व की इतिहास यात्रा में उन्हें एक मानवता कदम बढाती दिखाई देती थी। किसी भी देश में जो कुछ प्रगति हुई वह उनकी दृष्टि में संपूर्ण मानवता की उपलब्धि थी। अतः उन्होंने विश्व संघ की ही कल्पना नहीं की, विश्व - संस्कृति का भी साक्षात किया और उसकी व्याख्या की। दुनिया में पहली बार राजनीतिक और सांस्कृतिक धरातल पर विश्व की एकता का प्रयास करने वाला महामानव अवतरित हुआ था।
और आजादी के बाद उनका यही सार्वभौम दृष्टिकोण बना रहा। भारत के एकच्छत्र नेता और सूत्रधार होते हुए भी उन्होंने अपना यह सार्वभौम दृष्टिकोण नहीं बदला। वे जब बोले विश्व के लिए बोले; भारत के लिए विश्व के हित का बलिदान उन्होंने कभी नहीं किया। विश्व शांति के वे देवदूत थे, पैगंबर थे। अपने देश में अणु बम न बनाने का उन्होंने संकल्प कर लिया। कोरिया, कांगो और वियतनाम में उन्होंने पीड़ित मानवता के घावों पर मरहम रखा। अणु बम निर्माण और परीक्षण विरोधी सम्मेलन कराए, गुटों से अलग रहने की नीति अपनाई, इंडोनेशिया की आजादी की जोरदार पुकार की, स्वेज नहर पर बलात अधिकार का प्रबल विरोध किया, बांडुंग, कोलंबो, पंचशील विश्व- इतिहास के पद चिन्ह बन गए।
भारत के लिए उन्होंने स्वतंत्र पर-राष्ट्रनीति का सूत्रपात किया, व्यापकतम प्रजातंत्र की पक्की नींव डाली, उसे समाजवाद की ओर अग्रसर किया, बड़े उद्योगों की ओर कदम बढ़ाए, मिश्रित अर्थ व्यवस्था चालू की, नदी घाटी योजनाओं द्वारा सिंचाई और शक्ति के स्रोत स्थापित कर बाढ़ नियंत्रण का प्रयास किया। कोई भी लोक-हितैषी सरकार इनमें से एक भी नीति नहीं छोड़ सकती। यद्यपि इनमें से कुछ नीतियां राष्ट्रपिता की नीतियों से भिन्न और प्रतिकूल भी हैं, पर दोनों के मूल सिद्धांत एक हैं और राष्ट्रपिता के ही अनुयायी कांग्रेस जनों के लिए ये सभी अनिवार्य हो गई है। उनके महाप्रयाण के तीन वर्ष बाद भी, सरकार कहीं से इन नीतियों में कोई परिवर्तन नहीं कर पाती।
भारत का यह सपूत संसार की प्रशंसा और विस्मय का पात्र बन गया। विश्व ने उसकी आवाज पर कान खड़े किए और उससे प्रभावित हुआ। अरब देशों ने उसे 'शांति का देवदूत' कहा, दलाई लामा ने 'तिब्बत का सबसे बड़ा मित्र' कहा, रूस ने 'भारत के महान पुत्र' की फिल्में दिखाईं।
इसलिए जब यह महापुरुष दुनिया को छोड़ अक्षय लोक को चला, तो 'बावजूद सूरज के, दोनों गोलार्द्धों में रात एक साथ उतर आई।' भारत को लू सी लगी। विश्व एक क्षण के लिए स्तब्ध हो गया। दुनिया का एक रत्न खो गया। हम भारतवासी पुनरुज्जीवन की राह देख रहे हैं। वह हमारा मसीहा फिर कब आएगा। पृथ्वी के भाग्य जगे थे, जब वह आया था।
करती है फरियाद ये धरती कई हजारों साल।
तब दुनिया में पैदा होता है एक जवाहरलाल ।।
49. गांधीवादी जवाहरलाल
श्री जवाहरलाल नेहरू अपने समय के सर्वश्रेष्ठ गांधीवादी थे - सरदार पटेल, काका कालेलकर, राज गोपालाचारी, यहां तक कि स्वयं आचार्य बिनोबा भावे से भी बड़े।
सरदार पटेल की मुस्लिम नीति (1947-48) गांधीजी की नीति के विरूद्ध थी।
राज गोपालाचारी जी Quit India आंदोलन के विरूद्ध थे और हिंदी-हिंदुस्तानी के विरूद्ध उन्होंने आंदोलन चलाया था।
कालेलकर साहब ने गांधीय कार्यक्रम की प्रगति के लिए कुछ नहीं किया।
बिनोबा जी ने बहुत कुछ किया, पर उनका कार्य क्षेत्र बहुत सीमित था और केवल कभी-कभी ही वे सक्रिय होते थे।
पर जवाहरलाल नेहरू सभी प्रमुख और मौलिक प्रश्नों पर गांघीजी के साथ एक थे। प्रजातंत्र, हिन्दू-मुस्लिम एकता, हिन्दी-हिंदुस्तानी, हरिजन, निरस्त्रीकरण और विश्व-शान्ति - इन सभी विषयों पर वे गांधीजी के अप्रतिम अनुयायी थे, इन सभी बातों में शिष्य गुरु के कदम में कदम मिलाकर गुरु के जीवन काल में, और गुरु के कार्यों को ही अपनी देशी-विदेशी नीति का मूलाधार बनाकर गुरु के देहावसान के बाद, चला। गुरु का मानव-प्रेम शिष्य के संसार भर की पराधीन जनता की स्वाधीनता के सफल प्रयत्न के रूप में प्रस्फुटित हुआ। धन्य था गांघीवादी जवाहरलाल। इस युग का वह दूसरा मसीहा था......... गांधी का प्यारा जवाहर !
50. श्री जयप्रकाश नारायण (29/10/1978)
वर्तमान शताब्दी के चौथे दशक में श्री जयप्रकाश नारायण उच्च कोटि के समाजवादी थे। वे भारत के कांग्रेस समाजवादी दल के नेता थे, जिसमें आचार्य नरेंद्र देव, अच्युत पटवर्धन, युसूफ मेहर अली, डॉ राम मनोहर लोहिया जैसे महारथी सदस्य थे। उन्होंने Why Socialism ? नामक पुस्तक लिखी थी, जिसमें मार्क्सवाद का प्रतिपादन किया गया था, और जिसमें उन्होंने अपने को मार्क्सीय समाजवादी कहा था। उनके विषय में महात्मा गांधी ने लिखा था कि पाश्चात्य समाजवाद का ज्ञान उन्हें किसी भी अन्य भारतीय से अधिक है।
Why Socialism ? नामक अपनी पुस्तक में श्री नारायण ने मनु की मार्क्स से तुलना की थी और मनु की व्यवस्था को अनुपयुक्त बताया था। उन्होंने मार्क्सवाद और गांधीवाद की भी तुलना की थी और गांधीवाद को भारतीय समस्याओं, विशेषत: गरीबों की समस्या का समाधान करने में बुरी तरह अक्षम पाया था। उन्होंने गांधीवाद की जोरदार आलोचना की थी और उसका विस्तृत परीक्षण करते हुए उसके प्रत्येक पक्ष को आपत्तिजनक पाया था। स्थान-स्थान पर वे स्वयं गांधी जी के प्रति भी, उनके धरोहर सिद्धांत आदि के कारण, कटु हो गए थे। उन्होंने जवाहरलाल नेहरू को आदर्श समाजवादी माना था, जिनको वे समझते थे कि सत्ता में आने पर उनकी (जयप्रकाश जी की) धारणा का समाजवाद देश में लाएंगे।
जय प्रकाश नारायण कांग्रेस के वामपक्ष के नेता हो गए। वे तथाकथित गांधीवादियों के विरुद्ध थे, जिन में सरदार पटेल भी शामिल थे। सरदार पटेल हरिपुरा कांग्रेस में उनसे और उनकी पार्टी से इतने चिढ़े हुए थे कि उन्होंने कहा कि 'इन वर्षों में समाजवादियों ने हमें काफी कष्ट दिया है और अब हम इसका बदला चुका रहे हैं।' दूसरी ओर कांग्रेस के विषय में उनके ये उद्गार थे: ' पिछले दो वर्षों का कांग्रेस का इतिहास स्वर्णाक्षरों में लिखा जाने योग्य है।' यह दो वर्ष 1936 -38 के थे, जब जवाहरलाल इसके अध्यक्ष थे।
1939 के कांग्रेस अध्यक्ष के चुनाव में श्री जय प्रकाश नारायण और उनकी पार्टी ने डा. पट्टाभिसीतारमैया के विरुद्ध श्री सुभाष चंद्र बोस को वोट दिया था। पर त्रिपुरी कांग्रेस में, जब पंत- प्रस्ताव ने नए अध्यक्ष के अधिकार काटने चाहे और यथार्थ में उन्हें दोषी घोषित किया, तो उन्होंने उस प्रस्ताव का विरोध नहीं किया, बल्कि अपने दल वालों को तटस्थ रहने का निर्देश किया। अचानक इस पहल - परिवर्तन का सारा उत्तरदायित्व उन्होंने अपने ऊपर लिया। सुभाष बाबू के समर्थक पराजित हुए और पंत - प्रस्ताव स्वीकृत हुआ, जिसकी परिणति अंत में सुभाष बाबू के त्यागपत्र में हुई। उनके इस कार्य को 'त्रिपुरी का विश्वासघात' नाम दिया गया। पीछे चलकर जयप्रकाश जी ने सुभाष बाबू के कुछ भाषणों पर टीका करते हुए उन्हें 'दुर्भावनाग्रस्त' भी बताया
जयप्रकाश नारायण गांधी जी का आदर करते थे और कुछ दूर तक उनके अनुयायी भी थे। पर वे उनकी नीतियों और कार्यक्रमों के औचित्य के कायल नहीं थे। स्वाधीनता प्राप्ति के गांधी जी के तरीकों पर उनका विश्वास नहीं था। देवली कैंप जेल से निष्कासित स्वाधीनता प्राप्ति के अपने कार्यक्रम में उन्होंने हिंसा को समर्थन दिया था। फिर जब कांग्रेस ने अगस्त 1942 में अपना 'भारत छोड़ो' आंदोलन आरंभ किया, तो जयप्रकाश जी की अधीर आत्मा उन्हें जेल के सींकचों के भीतर रहने न दे सकी और वह हजारीबाग जेल से निकल भागे। यह एक वीरता तथा देशभक्ति से भरा काम था, पर क्या यह बुद्धिमत्ता पूर्ण काम भी था? वे आंदोलन का नेतृत्व प्रदान करने के लिए जेल से निकले थे, पर उनकी सारी शक्ति अपने को छिपाए रखने में ही लगी रही और वे आंदोलन को कुछ भी प्रगति नहीं दे सके। अपने गुप्त स्थान से निकाले गए एक पर्चे में उन्होंने इसे स्वीकार किया और अपना यह मत दिया कि भारतीय जनता का उत्साह शिथिल हो गया है और उसमें सक्रियता तभी आ सकती है जब जापानी आक्रमण जैसी कोई विपत्तिजनक घटना घटे। उनके कार्य की तुलना में विदेश से होने वाले सुभाष बाबू के कार्य अधिक पौरुषयुक्त, राजनेतोचित और कारगर थे।
स्वाधीनता के बाद जयप्रकाश जी ने अपना और अपने दल का कांग्रेस से संबंध-विच्छेद कर दिया। यह उचित ही था क्योंकि अब पार्टियों को उनके सामाजिक - आर्थिक कार्यक्रमों के अनुसार बनाने की आवश्यकता थी। इसी बीच गांधी जी की हत्या हुई और जयप्रकाश नारायण ने भारतीय गृह मंत्री श्री सरदार पटेल को इसके लिए पूर्णत: उत्तरदायी घोषित किया। उनका आरोप था कि सरदार पटेल महात्मा की सुरक्षा की पर्याप्त व्यवस्था करने में असफल रहे। उन्होंने घोषणा की कि एक 74 वर्ष के बूढ़े को अपने हाथों में शासन के तीन-तीन विभाग - गृह, देशी राज्य और समाचार - नहीं लेना चाहिए था। उन्होंने सरदार को सत्ता का लोभी भी कहा।
पर उनका नया समाजवादी दल आलोचक मात्र रहा। वह देश के लिए कोई सर्वतोमुखी नीति और कार्यक्रम नहीं बना सका। मुझे निश्चय है, कोई पार्टी केवल आलोचना पर नहीं बनती। उनकी पार्टी का नेतृत्व, कुछ योग्य व्यक्तियों के बावजूद, प्रभावशाली नहीं था। वह नेहरू जी की कांग्रेस के सामने अत्यंत दुर्बल जान पड़ा। अतः उन्होंने कृपलानी जी की किसान - मजदूर- प्रजा पार्टी से संधि की। सिद्धांत से समझौता करने और अन्य नेताओं की भांति 'व्यावहारिक' बनने की जयप्रकाश जी की प्रवृति उस समय पहले-पहल दिखाई पड़ी, जो 1977 में अपने निकृष्टतम रूप में प्रकट हुई। जयप्रकाश जी ने शीघ्र पार्टी को कृपलानी जी के पार्टी में विलयित कर दिया और इस प्रकार प्रजा-सोशलिस्ट पार्टी बनी। कृपलानी समाजवादी न तब थे, न अब हैं और उनकी पार्टी में विलयित होने का मतलब था सिद्धांत के मौलिक आधारों का परित्याग। कितनी प्रगति थी! अब तक का मार्क्सवादी अब प्रजा-समाजवादी था।
पर यह संघटन भी नेहरू कांग्रेस का सामना करने योग्य नहीं था। 1952 के आम चुनाव में इसने भूमि चाट ली। भग्नाशा में जयप्रकाश जी ने राजनीति से संन्यास ले लिया। उन्होंने और भी प्रगति की। वे अब अतिप्राकृतवाद में विश्वास करने लगे। कहा जाता है कि 1952 के लगभग उनका विचार यह हो गया था कि ईमानदार और सामाजिक उत्तरदायित्व से युक्त होने के लिए यह आवश्यक है कि किसी अतिप्राकृत शक्ति में विश्वास किया जाए। मार्क्स और लेनिन भी ईमानदार और सामाजिक उत्तरदायित्व संपन्न व्यक्तियों के समाज की ही रचना कर रहे थे, पर उन्हें किसी अतिप्राकृत सत्ता की जरूरत नहीं महसूस हुई। पर इन नए मार्क्सवादी जयप्रकाश जी को इसकी आवश्यकता थी।
स्वाधीनता के बाद से पटेल और नेहरू ने सदा इस बात का आग्रह किया कि जयप्रकाश जी किसी उत्तरदायित्व के स्थान में रखे जाएं। पटेल समाजवादी नहीं थे। जयप्रकाश जी उन्हें यथा स्थिति वादी कहते थे। फिर भी पटेल चाहते थे कि जयप्रकाश जी किसी प्रांत का भार लें और समाजवाद की उपयुक्तता दिखाएं। नेहरू सदा उन्हें अपनी मंत्री परिषद मैं सम्मिलित होने को आमंत्रित करते थे। उन्होंने 1952 में पार्टी की पराजय के बाद भी किया। पर जयप्रकाश जी ने इसे सदा अस्वीकार किया। वह उत्तरदायित्व मुक्त रहना चाहते थे ताकि उत्तरदायित्व वाले स्थान पर स्थित व्यक्तियों की भलीभांति आलोचना कर सकें।
जयप्रकाश जी अब राजनीति से विरत हो गए और अपनी पार्टी से भी नाता तोड़ लिया। वे विनोबा जी के सर्वोदय आंदोलन में सम्मिलित हो गए और उनके कनिष्ठ होकर भूदान का जोरदार प्रचार करने लगे। मार्क्सवादी और हिंसात्मक क्रांतिकारी से अब वे गांधीवादी हो गए, केवल गांधी जी का योद्धा उनमें नहीं रहा। वे विनोबाजी से इतने प्रभावित हो गए कि उनका नाम भी लेना उन्होंने बंद कर दिया और सार्वजनिक सभाओं में उन्हें 'बाबा' कहने लगे। एक मार्क्सवादी का 'बाबावाद' का विश्वासी बन जाना एक आश्चर्यजनक बात थी। पता नहीं इसे क्या कहा जाए, प्रगति या घोर अधोगति। केवल इतना ही नहीं, कोई बंगाली अति प्राकृतवादी पटना में कुछ वर्ष पूर्व आया तो जयप्रकाश जी ने इंडियन नेशन में एक लेख लिखकर उसके चमत्कारों की विस्तृत चर्चा की। कुछ ही दिन बाद उसकी पोल खुल गई और वह पटने से गायब हो गया क्योंकि उसके रहते ही उसी इंडियन नेशन में दूसरे लेखकों ने उसकी पोल खोली।
इस शताब्दी के छठे दशक में जयप्रकाश जी ने डॉ. श्रीकृष्ण सिंह से अपनी शक्ति-परीक्षा की, जिसमें वह पराजित हुए। उन्होंने नेहरू को हंगेरी में रूसी आतंक की अपेक्षा स्वेज में अंग्रेज- फ्रांसीसी आक्रमण का तीव्रतर विरोध करने के कारण 'द्वैध मापदंड' का दोषी ठहराया। स्वयं उन्होंने दक्षिण कोरिया में उत्तर कोरिया की घुसपैठ को तो 'आक्रमण' बताया था और जब दक्षिण कोरिया उत्तर कोरिया में घुसा तो चुप रह गए थे ; यद्यपि नेहरू जी ने दोनों की निंदा की थी। भारत के किसी महान नेता से जयप्रकाश जी की नहीं पटी - न गांधीजी से, न सरदार से, न नेहरू से। उन्होंने डॉ. राजेंद्र प्रसाद को भी नहीं छोड़ा, जब उन्होंने 1938 में किसान सभा के सदस्यों को कांग्रेस में लिए जाने पर रोक लगा दी थी।
शताब्दी के सातवें दशक में जयप्रकाश जी ने धर्म सापेक्ष राज्य पाकिस्तान और धर्म निरपेक्ष राज्य भारत के बीच अल्पसंख्यकों के प्रति व्यवहार के मामले में समता स्थापित की। उन्होंने इन बातों को नजरअंदाज कर दिया कि भारत ने मुसलमानो को बराबरी के संवैधानिक अधिकार दिए थे और उनके लिए विधानसभाओं में, संसद, राज्य तथा संघ-मंत्री परिषदों में, उच्च तथा सर्वोच्च न्यायालयों - यहां तक कि भारतीय राष्ट्रपति के सर्वोच्च पद तक के द्वार खोल दिए थे। फिर भी उन्होंने सीधे कह दिया कि भारत में मुसलमान की वही स्थिति है, जो हिंदुओं की पाकिस्तान में है। उन्होंने इसकी भी शिकायत की कि कश्मीर पर भारत बलात शासन कर रहा है और दो दशाब्दियों के इतिहास को भुला बैठे। इन्हीं कारणों से श्री अटल बिहारी वाजपेई ने उन्हें 'भारतीय राजनीति के सबसे बड़े विदूषक' की उपाधि दी थी।
1974 तक वे सक्रिय राजनीति से अलग रहे। फिर भी अपने लेखों में वे यदा-कदा राजनीतिक सुधार के प्रश्न पर विचार किया करते थे। उन्होंने दल - रहित प्रजातंत्र का प्रतिपादन किया। यह स्पष्टतः एक असंभव विचार था, जो लगभग हजार वर्ष के प्रजातांत्रिक विकास के क्रम में संसार के किसी भाग में प्रस्तुत नहीं किया गया था। लास्की या कोल या रसेल किसी के दिमाग में ऐसी बात नहीं आई थी, किसी भी प्रजातांत्रिक राष्ट्र की जनता को इसकी आवश्यकता महसूस न हुई थी। इस प्रस्ताव का बेतुकापन इसी से स्पष्ट है कि उनके समर्थक किसी राजनीतिज्ञ - लोहिया, कृपलानी या चरण सिंह ने इसका समर्थन नहीं किया और वे स्वयं भी जब उनकी चुनी हुई पार्टी सत्तारूढ़ हो गई, तो इस प्रस्ताव को छोड़ बैठे हैं।
1974 में सक्रिय राजनीति में पुनः प्रवेश करने का उन्होंने अवसर पाया। पटना के कुछ छात्रों ने गैर कानूनी और अराजक कार्य किए और जयप्रकाश जी उनमें शामिल हो गए। आरंभ में उनकी मांगे दूरगामी नहीं थीं, उनकी प्रक्रिया मात्र प्रदर्शनात्मक थी, पर ये मांगे शीघ्र बिहार विधानसभा के सदस्यों के आसामयिक त्यागपत्र की असंवैधानिक और अप्रजातांत्रिक मांग में बदल गई। इसके लिए अपनाई गई विधि बलात्कारी हो गई। बिहार में अराजकता का राज्य कायम हो गया और तत्कालीन प्रधानमंत्री का समझौते का प्रयत्न जयप्रकाश जी के विधान सभा सदस्यों के त्याग-पत्र के आग्रह की शिला पर टूट गया।
इस काल में उन्होंने भारत को 'संपूर्ण क्रांति' का नारा दिया। किसी को भी मालूम नहीं कि कौन-से स्थूल अवधान इस शब्द में निहित हैं और मुझे संदेह है कि यह उन्हें भी मालूम नहीं है। उन्होंने कभी इसे परिभाषित नहीं किया है। हम लोग फ्रांसीसी क्रांति और रूसी क्रांति से परिचित है और ये अभी भी हमारे मन में स्पष्टतः चित्रित हैं। यह 'संपूर्ण क्रांति' अवश्य ही इन क्रांतियों से अधिक मौलिक, जीवंत और विस्तृत होगी। फिर भी शायद इसमें दहेज प्रथा को समाप्त करने, प्रशासन से भ्रष्टाचार मिटाने, विधायिका से वापसी के संवैधानिक अधिकार आदि के अतिरिक्त और कुछ नहीं था । इसमें पूंजीवाद की समाप्ति, जीविका के अधिकार जैसी मौलिक चीजें नहीं थीं। वस्तुत: इसका सब कुछ अस्पष्ट और धुंधला था, जैसा श्री कृपलानी ने भी कहा है। वर्तमान सरकार, जिसे वे अपनी ही संतान मानते हैं, इसकी स्थापना के लिए, अथवा यह जानने के लिए कि यह क्या है, कुछ भी चिंतित नहीं है। शायद संपूर्ण क्रांति का अर्थ श्रीमती इंदिरा गांधी की पूर्ण पराजय तथा भारतीय राजनीतिक परिदृश्य से उनके संपूर्ण उन्मूलन के अतिरिक्त कुछ नहीं।
1975 में उन्होंने भारतीय सेना और पुलिस को गैर कानूनी और असंवैधानिक आदेशों की अवज्ञा करने का आह्वान किया। यह सैनिक और पुलिस अनुशासन के अथवा यूं कहें कि किसी भी अनुशासन के, सर्वथा प्रतिकूल है। इसके बाद उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री को, जो इलाहाबाद उच्च न्यायालय से अपना चुनाव मुकदमा हार गई थीं, त्याग-पत्र देने को कहा। आरंभ में उनकी यह मांग एक परामर्श मात्र थी, पर बाद में यह एक आदेश हो गई, जिसके पीछे अब एक अखिल भारतीय आंदोलन की धमकी थी। इसका परिणाम आपातकाल की घोषणा थी।
1976 में अपनी रिहाई के बाद उन्होंने विरोधी पार्टियों से एकता स्थापित करने की अपील की। तत्कालीन संगठन कांग्रेस ने इस अपील को ना- मंजूर कर दिया। पर जब 1977 में लोकसभा के चुनाव की घोषणा हुई, तब ये पार्टियां स्वतः एक हो गईं। बहुरूपी दलों की यह एकता, जिनके विभिन्न और प्राय: परस्पर विरोधी राजनीति एवं सामाजिक आदर्श थे,स्पष्टत: एक सुविधा की शादी थी, जिसका एकमात्र उद्देश्य एक नकारात्मक कार्यक्रम - इंदिरा का उन्मूलन - था ; उनका कोई रचनात्मक ध्येय, जनकल्याण का कोई सर्वसम्मत दूरगामी कार्यक्रम हो ही नहीं सकता था। वह स्थाई भी नहीं हो सकती थी, और केंद्र में एक ढुलमुल और अस्थिर सरकार की बना सकती थी। पर जय प्रकाश नारायण ने, सभी सिद्धांतों की तिलांजलि देकर, इसे अपना समर्थन और शुभकामना दी। इसने कांग्रेस को हरा दिया और शासन की बागडोर संभाली।
जयप्रकाश जी के लिए संपूर्ण क्रांति सफल हो गई थी। अब दल रहित प्रजातंत्र की कोई चर्चा न थी, न विधायिका के सदस्यों की वापसी के अधिकार का कोई मांग रह गई थी, न मीसा या पीडीए को समाप्त करने की अधीरता थी। अब वे चुपचाप सांप्रदायिक दंगे, पुलिस की गोलियां, जनता पार्टी के सदस्यों की पारस्परिक निंदा, प्रशासन का बढा हुआ भ्रष्टाचार, जनता पार्टी के बड़े-बड़े नेताओं द्वारा ही जनता सरकार की भर्त्सना, समाज में बहुव्यापी अशांति, विश्वविद्यालय में उपद्रव, विश्व विद्यालय परीक्षाओं में अवैध साधनों का निर्बाध उपयोग, छात्र अनुशासन हीनता के कारण विश्व विद्यालयों की लंबी तालाबंदी - इन सब का मूक अवलोकन कर रहे हैं और विरोध में एक शब्द भी नहीं कहते। इसीलिए मैं कहता हूं कि उनकी संपूर्ण क्रांति सफल हो गई है।
हाल में सरदार पटेल के जन्मदिवस के अवसर पर उनकी प्रशंसा करते हुए जय प्रकाश जी ने लिखा कि सरदार के प्रति उनके पिछले विरोध का रुख गलत था। उन्होंने एक व्यक्ति और राजनेता के रूप में उनके गुणों की प्रशंसा की और इस संबंध में भूतपूर्व प्रधानमंत्री नेहरू जी की नीतियों की विस्तृत आलोचना और निंदा की। एक महापुरुष के जन्म दिवस पर एक दूसरे महापुरुष की, विशेषत: उसकी मृत्यु के बाद, निंदा करना और देश के प्रति उसकी की हुई सेवाओं को बिल्कुल भूल जाना कितनी भद्दी रुचि का परिचायक है, इसका अनुमान सहज ही किया जा सकता है ; पर साथ में यह भी नहीं भूला जा सकता कि ये वही सरदार हैं जिन को जयप्रकाश जी ने सत्ता का लोभी और यथास्थितिवादी कहा था। यदि ऐसा कहना गलत था, तो क्या जयप्रकाश जी उस समय कोई राजनीतिक नवसिखुए थे या किसी मूर्छा में थे और उनमें राजनीतिक परिपक्वता और होश आज आया है ? अथवा आज भी वह नहीं आया और किसी दिन वे यह भी कह डालेंगे कि 1974 - 78 तक के उनके सारे कार्य गलत थे। मैं समझता हूं कि कुछ दिन बाद उनकी आंखें खुलेंगीं और शायद वे कहेंगे कि उक्त कल में मैं भ्रम में था और उन दिनों जो कुछ किया, वह सब गलत था।यदि सिर्फ एक बात लें, तो क्या हम पूछ सकते हैं कि 1974 में जिस शिक्षा पद्धति को भ्रष्ट कहकर उन्होंने छात्रों को एक वर्ष के लिए पढाई छोड़ देने को कहा था, उसे क्या जनता पार्टी की सरकार पिछले डेढ़ वर्षों के शासन काल में बदल पाई है, या उसे जीवीकोन्मुख (job oriented) बना पाई है या बनाने का कुछ भी प्रयास कर रही है ?
मुझे निश्चय है कि पिछले चार वर्षों में उन्होंने जो कुछ किया है, वह दुर्भावनाग्रस्त (वही विशेषण जो उन्होंने सुभाष बाबू पर 1939 में आरोपित किया था) होकर किया है और वह दिन दूर नहीं जब उनका किया हुआ सब कुछ ताश के महल के समान नष्ट - भ्रष्ट हो जाएगा।