हिन्दू काल का अन्त
हिन्दू काल का अन्त
(५) हिन्दू काल का अन्त :— (१) कन्नौज राज्य, ६०६-४७ — गुप्त साम्राज्य के विघटन से देश छोटे-छोटे राज्यों में बंट गया था। ६०६ में सतलज-जमुना दोआब में प्रभाकरवर्द्धन ने एक स्वाधीन राज्य बनाया जिसकी राजधानी थानेसर थी। उनकी मृत्यु के बाद राज्यवर्द्धन राजा हुए, पर उनके बहनोई कन्नौज-राज को मालव-राज ने मार कर उनकी बहन राज्यश्री को कैद कर लिया। इस पर राज्यवर्द्धन मालवराज को हरा दिया पर उनके सहायकों द्वारा मार डाले गए। तब हर्षवर्द्धन थानेश्वर के राजा हुए। उन्होंने विन्ध्य पर्वत में छिपी हुई राज्यश्री को ढूंढ निकाला और उन्हें राजधानी ले आए। फिर उन्होंने गौड़-राज को हरा दिया। इस प्रकार वे अरबसागर से बंगाल की खाड़ी तक और हिमालय से नर्मदा तक के सम्राट हुए। उन्होंने गुप्त साम्राज्य की पुरानी सीमाओं को वापस कर लिया। ह्वेनसांग के अनुसार वे स्वयं अपने साम्राज्य का निरीक्षण करते थे। कृषक-कर १/६ से अधिक नहीं था। सड़कें और सरायें थीं, अस्पताल थे, और सार्वजनिक शिक्षा की व्यवस्था थी। स्वयं हर्ष ने तीन संस्कृत नाटक लिखे। वे धर्मात्मा थे। बौद्ध होते हुए भी वे बुद्ध, सूर्य और शिव की पूजा करते थे।
(२) अन्धकार युग, ६५०-१२०० — हर्षवर्द्धन की मृत्यु के बाद बहुत से छोटे-छोटे राज्य हो गए, जिनकी सीमाएं बराबर बदलती रहती थीं। राजपूत पहले पहल प्रकट हुए। जो भिन्न-भिन्न विदेशी जातियां समय-समय पर भारत में आई थीं वे कालक्रम से हिन्दू बन गई थीं, और उनमें जो युद्धप्रिय थीं, वे अपने-अपने नेताओं के अधीन अलग-अलग वंशों में बंट गईं। वे क्रमशः राजपूताना, पंजाब, कश्मीर, अवध और मध्य हिमालय तक फैल गईं। ९०० से १२०० का समय राजपूत युग कहा जा सकता है। उनके कम से कम छत्तीस वंश थे।
(३) दक्षिण के राज्य — जिस समय आर्य उत्तर भारत में बस रहे थे, उस समय नीलगिरि के दक्षिण तीन तमिल राज्य बन रहे थे : पाण्ड्य, चेर (केरल), और चोल। पूर्वी तट पर दो और राज्य थे : कलिंग, और वेगी (आन्ध्र), जो कुछ समय तक अशोक के अधीन रहे थे, पर पीछे स्वतन्त्र हो गए थे।
गुप्त साम्राज्य के विघटन के बाद दक्षिण में निम्नलिखित बड़े-बड़े राज्य स्थापित हुए :— (क) बादामी के चालुक्य (५५०-९५१) — एक राजपूत सरदार पुलकेशिन I (५५०-६०८) ने बीजापुर के वातापी में राज्य स्थापित किया। उनके पौत्र पुलकेशिन II (६०८-४२) ने हर्ष को नर्मदा पार करने से रोका (६२०) और गुजरात, मालवा, वेंगी और कांचीपुर को जीता और पन्नार नदी तक राज्य विस्तृत किया। ह्वेनसांग उनके राज्य में आए थे और उनकी पैदल तथा गज सेना के बल का उल्लेख किया है। वे पल्लवों द्वारा पराजित होकर मार डाले
गए (६४२)। उनके उत्तराधिकारियों ने पीछे पल्लवों को कई बार हराया, पर इससे उनकी बहुत अर्थ-हानि हुई और ९५० में उनके एक विद्रोही राष्ट्रकूट सरदार ने उनकी गद्दी छीन ली।
(ख) राष्ट्रकूट, ९५०-९७३ — ये विदेशी थे, पर लम्बे निवास के कारण स्वदेशी बन गए थे। इनके काल में हिन्दू धर्म जनता में फैला, इसके विषय में ग्रंथ लिखे गए, मन्दिर बने, और चट्टानें काट कर मन्दिर बनाए गए, विशेषतः एलोरा में (औरंगाबाद के निकट)। ये अपने पूर्व अधिकारियों से अधिक युद्धप्रिय थे, और अंत में अपने एक विद्रोही सरदार तैलप द्वारा अपदस्थ किए गए (९७३)।
(ग) कल्याण के चालुक्य, ९७३-११९० — तैलप चालुक्य वंशी थे। चोल राज्य से इनका बराबर युद्ध चलता रहा। राज राजा महान् चोल ने इनके राज्य को बुरी तरह बर्बाद किया। पर उनके उत्तराधिकारी सोमेश्वर चालुक्य ने कोप्पम के युद्ध में राजाधिराज चोल को मार डाला (१०५२)। एक दूसरे राजा विक्रमांक (१०७६-११२६) की वीरता के गान बिल्हण ने गाए हैं।
(घ) पूर्वी चालुक्य — बादामी के चालुक्य पुलकेशिन II ने वेंगी को जीतकर अपने भाई विष्णुवर्द्धन को वहां का राज-प्रतिनिधि बनाया था। पर ये स्वतन्त्र हो गए। ये भी युद्ध के चक्कर में फंस गए। राजराजा चोल ने वेंगी को भी तहस-नहस किया और अपनी पुत्री चालुक्य राज को ब्याही।
(ङ) पल्लव — समुद्रगुप्त ने कांची के पल्लवराज को हराया था। ४०० ई. के बाद इनका समृद्धिकाल आया और ये दक्षिण भारत की प्रभुशक्ति हो गए और अपने अधिकतम उन्नत काल में इनका राज्य महानदी से द० पन्नार तक और पश्चिम में बरार से बंगलोर तक विस्तृत था। ६४२ में इन्होंने पुलकेशिन II को हराया। पर ६९४ में पुलकेशिन के पुत्र ने इन्हें हरा कर कांची को ले लिया। ७४० में ये फिर हराए गए। इसके बाद इनकी अवनति
होने लगी और इनकी प्रमुखता का स्थान चोलों ने ले लिया (९००)। ये महान् भवन-निर्माता थे जिसका प्रमाण महाबलीपुरम् के सप्तशीर्ष मन्दिर और कांची के मन्दिर हैं।
(च) चोल (८६०-१३१०) — अशोक ने इनकी स्वाधीनता मानी थी। ८६० से ये महाशक्ति हुए। राजराजा महान् ने कल्याणी के चालुक्यों पर आक्रमण किया और उनके राज्य पर विनाश और संहार बरसाया जिसमें ब्राह्मण, स्त्री और बच्चे सभी मारे गए। वेंगी के चालुक्यों के भी ये संप्रभु बने और लंका को भी जीतकर उसे अपने राज्य में मिलाया (९८५-१००५)। इनके पुत्र राजाधिराज को चालुक्यों ने कोप्पम में हराया (१०५२) पर दस वर्ष बाद वे हराए गए। १२५० तक यह समृद्ध रहा, पर १३१० में मुस्लिम आक्रमण का शिकार हुआ और अन्त में विजयनगर में विलीन हो गया।