यथार्थ इतिहास
यथार्थ इतिहास
मौर्यकाल, ३२०-१८४ ई. पू. (१) चन्द्रगुप्त, ३२०-२९७ — ये नन्द-सेना के प्रधान सेनापति थे। स्वामी के असंतुष्ट होने पर इन्होंने उन्हें च्युत करना चाहा, पर सफल न हुए और भगे। सिकन्दर की मृत्यु के बाद इन्होंने विदेशी सत्ता के विरुद्ध भारतीय विरोध का नेतृत्व किया और पंजाब जीता। फिर नन्द पर चढ़ाई की और अन्तिम नन्द को हरा कर मार डाला। इनके हाथ मगध की सेना लगी जिसमें ३०००० घोड़े, ९००० हाथी, ६ लाख पैदल और बहुसंख्यक रथ थे। इस महती सेना के द्वारा उन्होंने बंगाल से सिन्धु तक राज्य-विस्तार कर लिया और सेल्यूकस को हरा कर अफगानिस्तान तक जीता।
शासन-प्रबंध — सेना-विभाग में छः बोर्ड बनाकर, जिनमें से प्रत्येक में पाँच सदस्य थे। राजधानी पाटलिपुत्र २५ मील के घेरे में थी जिसके चारों ओर खाई थी, और जिसकी दीवारों में ५७० बुर्ज और ६४ द्वार थे। इसका शासन छः समितियों के हाथ में था, जिनमें से प्रत्येक में ५ सदस्य थे। ये समितियाँ क्रमशः उद्योग-धन्धों, मजदूरों, विदेशियों, जीवन-मृत्यु, वाणिज्य, और नागरिक-कर की व्यवस्था करती थीं। साम्राज्य प्रान्तों में विभाजित था। राजनगर का प्रान्त सम्राट के अधीन स्थानीय प्रशासकों द्वारा शासित होता था; अन्य प्रान्त वाइसरायों द्वारा, जो राज-परिवार में होते थे। कृषि सीधे सिंचाई विभाग के अधीन थी और कृषिकर उत्पादन का चतुर्थांश था। सड़कों की मरम्मत हुई और नई बनाई गईं। दंड-विधान कठोर था।
(२) अमित्रघात बिन्दुसार, २९७-२७३ — इन्होंने मद्रास के अक्षांश तक विजय की।
(३) राजर्षि अशोक, २७३-२३२ — ई. पू. २६० में उन्होंने कलिंग-विजय की। राजपथों के दोनों ओर वृक्ष लगाए गए, स्थान स्थान पर कुएं खोदे गए और सरायें बनवाई गईं। कलिंग विजय के फलस्वरूप वे राजर्षि हो गए। उस युद्ध में १ लाख मरे थे और डेढ़ लाख बन्दी हुए थे। इससे अशोक को पश्चाताप हुआ। उन्होंने आगे सैनिक विजय से मुख मोड़ लिया। उन्होंने गेरुआ धारण किया और बौद्ध भिक्षु हो गए, पर सम्राट बने रहे। उन्होंने धर्म-नियम का प्रवर्तन किया। अपनी प्रजा को धर्म की शिक्षा दी और कर्मचारियों को प्रजा के प्रति दयालु होने का आदेश दिया। इससे बौद्ध धर्म का विस्तार हुआ और राज्य में सुख-शान्ति रही। ये धर्म नियम चट्टानों, गुहा-भित्तियों, और स्तंभों पर खुदवाए गए, स्थानीय बोलियों में और प्रसिद्ध देवस्थानों के निकट।
अशोक की मृत्यु के शीघ्र बाद साम्राज्य के टुकड़े टुकड़े हो गए। उनके पांच उत्तराधिकारियों ने राज्य किया, जिनमें अन्तिम मार डाला गया (१८४ ई. पू.)।
(३) मौर्य-साम्राज्य का विघटन (१८४ ई. पू. — ३२० ई.) :— अगले ५०० वर्ष तक भारत में कोई एकच्छत्र राज्य नहीं हुआ :— (१) शुंग वंश (१८५-७३) — पुष्यमित्र ने अन्तिम मौर्य सम्राट को मारकर मगध की गद्दी पर अधिकार किया। उनके अधिकार में मगध के निकटवर्ती प्रान्त थे, और उन्होंने नर्मदा तक अपना अधिकार फैलाया। अश्वमेध यज्ञ किया। (२) कण्व वंश (७२-२८) (३) आन्ध्र (२२० ई. पू. - २२५ ई.) — अशोक की मृत्यु के शीघ्र बाद गोदावरी और कृष्णा के बीच के निवासी आन्ध्र स्वतन्त्र हो गए और राज्य स्थापित किया। तीस राजे हुए। एक ने अन्तिम कण्व राजा को मार डाला। इनका राज्य दक्षिण में समुद्र से समुद्र तक फैला।
इस बीच भारत पर विदेशी हमले भी हुए :— (१) हिन्दुकुश और ऑक्सस के बीच २५० ई. पू. में बैक्ट्रिया सेल्यूसिड साम्राज्य से स्वतन्त्र हुआ। डेमेट्रियस (२००-१९०) ने अफगानिस्तान और पंजाब दबा लिया। मेनान्डर ने भारत पर आक्रमण किया और पाटलिपुत्र तक चढ़ आया (१७५), पर पीछे लौट गया। (२) पार्थियनों ने तक्षशिला तक जीता १२५ और सत्रपी कायम की। (३) शकों ने इसके बाद तक्षशिला को जीता। (४) फिर कुषाणों ने शकों और पार्थियनों को हराकर बनारस तक साम्राज्य-विस्तार किया।
गोंडो फर्न्स तक्षशिला के पार्थियन राजा थे। संत थॉमस का संदेश इन्हें मिला था (४८ ई.)। कनिष्क तीसरे कुषाण सम्राट थे (१२० ई.), जिनका साम्राज्य फारस से पामीर के उत्तर होते हुए पूर्व में जमुना-चम्बल संगम तक और दक्षिण में सिन्धु-सतलज संगम तक और अरब सागर तक विस्तृत था। इनके शासनकाल में बुद्ध ईश्वर मान लिए गए और उनकी मूर्ति की पूजा होने लगी। बौद्ध धर्म में और भी परिवर्तन हुए। इन विदेशियों द्वारा अपनाए जाने के कारण यह धर्म भारत का राष्ट्रीय धर्म नहीं रह गया और इसके देशी अनुयायी इससे अलग हो गए।
(३) गुप्त-काल, ३२०-६०० :— १. चन्द्रगुप्त I (३२०-२६) — ये एक स्थानीय राजा थे जिनका लिच्छवि-राजकुमारी से विवाह होने के कारण मगध में प्रभुत्व हो गया। वे अपने को महाराजाधिराज कहने लगे और अपना राज्य गंगा के दोनों ओर इलाहाबाद तक फैलाया।
२. समुद्रगुप्त (३२६-७५) — इन्होंने अपना साम्राज्य ब्रह्मपुत्र से जमुना-चंबल तक और हिमालय से नर्मदा-रेखा तक फैला दिया। दक्षिण में वे पूर्वी तट होते हुए कलिंग से कांची तक जीतते चले गए और लौटते हुए महाराष्ट्र और खानदेश को भी जीता। लौटकर अश्वमेध यज्ञ किया। इलाहाबाद के अभिलेख (प्रशस्ति) के अनुसार वे कवि-राज थे। अपनी सभा में उन्होंने विद्वानों को भी एकत्र किया।
३. चन्द्रगुप्त II विक्रमादित्य (३७५-४१३) — इन्होंने बंगाल और सिन्धु देश में युद्ध किए। मालवा, गुजरात और काठियावाड़ को जीतकर समुद्र तट तक अधिकार में किया। शान्ति और उन्नति रही। राजपथों पर सरायें थीं, और पाटलिपुत्र में निःशुल्क अस्पताल था। न्याय दया के साथ बर्ता जाता था। डकैती अज्ञात थी। कर हल्के थे, और कर्मचारी नियमित रूप से नियत वेतन पाते थे।
४. कुमारगुप्त I (४१३-४५५) — इन्होंने साम्राज्य को सुरक्षित रखा और अश्वमेध किया।
५. स्कन्दगुप्त (४५५-४८०) — हूणों के आतंक को रोका।
पर दूसरा आक्रमण (४५५-५६५) अगले १०० वर्षों तक जारी रहा। पिछले गुप्त शासक इसे रोक न सके और साम्राज्य टूट गया। हूण साइबेरिया के स्टेप्स से आए थे, गोरे, ठिगने, चौड़े कन्धे वाले, बलवान, और पश्चिमोत्तर घाटियों से भारत में उतरे थे। ५०० ई. में उन्होंने गांधार राज्य ले लिया और गुप्त क्षेत्र में घुसे। मालवा और बहुत सी गुप्त-भूमि उन्होंने ले ली। साम्राज्य खंड-खंड हो गया। इससे हूण निर्बाध होकर लूटते, जलाते और कत्लेआम करते रहे। हूण आतंक ५६५ में, जब उनका ऑक्सस का राज्य तुर्कों द्वारा नष्ट किया गया, समाप्त हुआ।
चीनी यात्री फाहियान गुप्तकाल में आया जिसने बड़े नगर, धनी और उन्नतिशील प्रजा, बहुसंख्यक सरायें, पाटलिपुत्र का निःशुल्क अस्पताल देखी। प्रजा पर न कर का बोझ अधिक था, न राज्य उससे अधिक छेड़खानी ही करता था। संस्कृत भाषा अप्रतिम साहित्यिक उत्कर्ष को प्राप्त हुई। चन्द्रगुप्त II की सभा में अनेक 'रत्न' थे जिनमें कालिदास प्रमुख थे। गणित और ज्योतिष का अभ्यास हुआ और स्थापत्य, मूर्ति, चित्र, तथा संगीत कलाएं विकसित हुईं। हिन्दू धर्म का पुनरुत्थान हुआ।