मुस्लिम काल
मुस्लिम काल
१. सिन्ध-विजय :— मु. बिन कासिम ने देवल के मन्दिर को भेंट कर लूटा और फिर सारे सिन्ध पर अधिकार किया। चित्तौड़ की उसका बढ़ाव बप्पा रावल ने रोका। इसके बाद १५०० वर्षों तक शान्ति रही।
२. ग़ज़नी वंश :— ग़ज़नी के राजा सुबुक्तगीन पर लाहौर के राजा जयपाल ने आक्रमण किया। पर सुबुक्तगीन ने लाहौर, दिल्ली, अजमेर और कालिंजर के राजाओं के संघ को हरा दिया और सिन्धु तक की भूमि पर अधिकार कर लिया। उसके पुत्र महमूद ने १००१ में जयपाल को पेशावर में हराया और सतलज पार कर भटिंडा को लूटा। १००८ में जयपाल के पुत्र आनन्दपाल को, उसके उज्जैन, ग्वालियर, कन्नौज, दिल्ली और अजमेर के सहायकों के साथ हरा दिया, यद्यपि विजय पहले हिन्दुओं के हाथ थी जो जयपाल के हाथी के बिगड़ने से छिन गई। ८००० सैनिक मारे गए। इसके बाद उसने नगरकोट के मन्दिरों को लूटा। १०१९ में १ लाख पैदल और २०००० घुड़सवार लेकर वह कन्नौज जा पहुँचा, पर लौट पड़ा और मथुरा के मन्दिरों और बहुमूल्य मूर्तियों को लूट कर जला दिया। १०२३ में उसने सोमनाथ का मन्दिर लूटा, पर लौटते हुए बड़ी हानि उठाई।
(३) गोर वंश :— मुहम्मद ग़ोरी (११८६-१२०६) ने मुलतान और फिर उच्च ले लिया और दो वर्ष बाद अन्हिलवाड़ पहुँचा। पर वहां से विफल लौटना पड़ा। फिर उसने लाहौर को ले लिया। इसके बाद उसने दिल्ली पर चढ़ाई की, पर तरैन के युद्ध में हार गया। दूसरे वर्ष वह उसी युद्ध में जीत गया। उसके बाद मुसलमानों ने अन्हिलवाड़ को भी जीत लिया, और बिहार, बंगाल और बुन्देलखण्ड के स्वामी हुए। जिस समय मु. ग़ोरी हिन्दुस्तान पर चढ़ाई करने की ताक में था, उस समय गुजरात में बघेला, कन्नौज में राठौर, दिल्ली में तोमर और अजमेर में चौहान राज्य कर रहे थे। पर उन सब में पृथ्वीराज चौहान बड़े थे। १ ११९१, ग़ोरी घायल हुआ और ४० मील तक खदेड़ा गया २ पृथ्वीराज मारे गए
(४) गुलाम वंश (१२०६-१२९०) :—
(१) कुतुबुद्दीन, १२०६-१२११ — वह ग़ोरी का गुलाम था और भारत का वाइसराय। उसने दिल्ली को अधिकृत किया और कन्नौज को जीता। उसके सेनापतियों ने बिहार और बंगाल को मुस्लिम साम्राज्य में मिलाया। ग़ोरी की मृत्यु के बाद (१२०६) वह राजा हुआ और गुलाम वंश की स्थापना की।
(२) अल्तमश, १२११-३६ — वह कुतुबुद्दीन का गुलाम था और उसका दामाद बना। फिर उसके राज्य का उत्तराधिकारी हुआ। उसे प्रतिद्वन्द्वी राजाओं से बराबर लड़ते रहना पड़ा और हिन्दुस्तान के अधिकतर भाग को वह अपने अधिकार में कर सका।
(३) रजिया, १२३६-३९ — वह अल्तमश की पुत्री थी। पिता के जीवन-काल में उसने शासन में सक्रिय भाग लिया था। पिता ने उसे उत्तराधिकारी नियुक्त किया था। उसने पुरुष वेश धारण किया, पर प्रजा सन्तुष्ट नहीं हो सकी। उसने अपने एक विरोधी सरदार से विवाह कर गद्दी बचानी चाही, पर दोनों मारे गए।
(४) नासीरुद्दीन, १२४६-६६ — ये भी अल्तमश के पुत्र थे। वे 'शाही फकीर' थे। उनके दामाद गयासुद्दीन बलबन ने मंत्री का पद संभाला और बड़ी योग्यता दिखाई। बागी रईसों को दबाया। मंगोलों की सहायता करने के कारण उसने गक्खरों को दंड दिया और स्वाधीनता के लिए प्रयासशील राजपूतों को दो बार बुरी तरह हराया।
(५) गयासुद्दीन बलबन, १२६६-८८ — वह स्वयं सुलतान हुआ। बंगाल के विद्रोह और पंजाब पर आक्रमण दबाए। बंगाल का विद्रोही तुगरिल खां था जिसके विरुद्ध उसने दो अभियान किए। पंजाब में उसके गवर्नर शेर खां ने मंगोलों को दबाया। शेर खां को मरवा कर उसने अपने पुत्र शाहजादा मुहम्मद को मुलतान का गवर्नर बनाया। मुहम्मद ने मंगोलों को उखाड़ फेंका, पर मारा गया (१२८५)। इस शोक में सुलतान की मृत्यु हो गई। उसके यहाँ मंगोलों से सताए हुए अनेक विदेशी राजाओं ने शरण ली थी।
(५) खिलजी वंश (१२९०-१३२०) :—
(१) जलालुद्दीन, १२९०-९६ — अन्तिम गुलाम राजा को फ़ारस से अफ़गानिस्तान होते हुए भारत आने वाले खिलजी सरदारों ने मार डाला, और उनमें से एक फ़िरोज शाह जलालुद्दीन खिलजी के नाम से गद्दी पर बैठा। वह ७० वर्ष का था। उसके भतीजे और दामाद अलाउद्दीन ने सल्तनत की रक्षा की, और अन्त में उसे मार डाला।
(२) अलाउद्दीन, १२९६-१३१६ — अपने चाचा के समय में ही उसने मालवा को जीता था, और बरार और खानदेश होता हुआ देवगिरि के हिन्दू राजा रामचन्द्र को लूटा जहाँ से हीरा, मोती, लाल, मरकत, रेशम लिए हुए लौटा। सुलतान होने पर उसने गुजरात पर चढ़ाई की और वहां का राजा भाग गया। उसकी पत्नी कमला देवी दिल्ली लाई गई और अलाउद्दीन से विवाह कर लिया। उसके कहने से उसकी पुत्री देवल देवी भी दिल्ली लाई गई और अलाउद्दीन के ज्येष्ठ पुत्र को ब्याही गई। मंगोलों ने छः बार चढ़ाई की, सबसे बड़ी १३०३ में, जबकि उन्होंने दिल्ली को दो महीने तक घेरा। अलाउद्दीन ने उन्हें हराकर ३०००० दिल्ली के निकट बसे हुए मुस्लिम मंगोलों को कत्ल करवा दिया। उसने १२९९ में रणथम्भौर के किले को लेने के लिए सेना भेजी जो हार कर लौट आई। तब वह स्वयं गया और एक वर्ष के घेरे के बाद किले का पतन हुआ। राजा, उसका परिवार और सेना मारी गई। तब वह चित्तौड़ पर चढ़ा (१३०३)। किले की चोटी तक मिट्टी भरवा कर उसने किले में प्रवेश किया। एक-एक राजपूत मर मिटा और स्त्रियों ने जौहर किया। फिर उसका सेनापति देवगिरि पर चढ़ाई कर राजा रामचन्द्र को पकड़ कर दिल्ली लाया जहां उसने आत्मसमर्पण किया। सालाना खिराज लेकर उसे राज्य लौटा दिया गया (१३०७), पर १३११ में उसके पुत्र हरपाल ने स्वाधीन होने की चेष्टा की। वह मारा गया और राज्य सल्तनत में मिला लिया गया। इसी बीच में वारंगल, मैसूर और मदुरा के राजा हराए गए, और आक्रमणकारी रामेश्वरम् तक पहुँचे। दक्षिण का बड़ा भाग सल्तनत में मिला लिया गया। शेष की लूट दिल्ली लाई गई। हिन्दू प्रजा पर वह विशेष निर्दयी था। उनसे उपज का आधा कर रूप में लेता था।
उसने अपने को द्वितीय सिकन्दर घोषित किया। वह सर्वथा निरक्षर था। राज्य के अन्त में विफलता, असंयम, निष्ठुरता और विद्रोह का मारा वह १३१६ की जनवरी में मर गया। उसका पुत्र मुबारक गद्दी पर बैठा, पर हर प्रकार के असंयम सहित ४ वर्ष के राज्य के बाद अपने प्रियपात्र खुशरू शाह द्वारा मार डाला गया, जिससे गद्दी हथिया ली, पर उसे ग़ाज़ी मलिक ने मार कर तुगलक वंश की नींव डाली (१३२०)।
(६) तुगलक वंश (१३२०-१४१४) :—
(१) ग़ाज़ी मलिक गयासुद्दीन तुगलक के नाम से गद्दी पर बैठा। उसे गद्दी का लोभ नहीं था, पर जनता ने उसे बैठाया। उसने अव्यवस्था दूर की और सरहदों को मंगोल आक्रमण के विरुद्ध मज़बूत बनाया। पर अपने पुत्र के षड्यन्त्र से मारा गया, १३२५।
(२) मुहम्मद तुगलक, उसका पुत्र, गद्दी पर बैठा। वह अरबी और फ़ारसी, तथा लॉजिक और ग्रीक दर्शन, एवं गणित और भौतिकी और चिकित्सा शास्त्र का ज्ञाता था तथा धार्मिक पुरुष था। उसने विद्वानों और अनाथों के लिए अस्पताल और दानगृह बनवाए। पर कभी-कभी शिकार में जाकर वह पशुओं के बदले मनुष्यों को मारने लगता था। उसने दिल्ली वालों को नई राजधानी दौलताबाद जाने के लिए ७०० मील बाध्य किया। फिर उन्हें दिल्ली लौटाया भी। उसने दोआब पर कड़ा कर लगाया, जिससे किसान भाग गए और अकाल पड़ गया। भागने वालों को मार डाला गया। सहायता बहुत देर से दी गई। उसने तांबे का टांका चलाया जिसका मूल्य चांदी के बराबर रखा। राज्य में रुई से टंके भर गए और उनका मूल्य गिर गया, जिससे व्यापार बंद हो गया। चार वर्ष के बाद उसने टंका-आदेश वापस ले लिया, पर अपूरणीय क्षति हो चुकी थी। उसने खोरासान, फ़ारस और चीन पर चढ़ाइयां की और असफल होकर लौटे हुए सिपाहियों को कत्ल कर दिया। उसकी गलतियों से साम्राज्य विघटित हो गया। बंगाल में विद्रोह (१३३८) हुआ, और दक्षिण में (१३५०); कोरोमंडल ने चढ़ाई की (१३४७), जिन्हें उपहार देकर लौटाया गया। १३५१ में मरा।
(३) फ़िरोज शाह ने राज्य में सुव्यवस्था लाने की कोशिश की। अकाल दूर करने के लिए उसने नहरें खुदवाईं। उसने फ़िरोजाबाद (दिल्ली) की मस्जिद पर अंग-भंग के विरोध में लिखवाया और इसे बन्द किया। उसने कर हल्के किए; विजय की लूट का पांचवां हिस्सा अपने लिए रखा, शेष सिपाहियों के लिए। उसने घायल और वृद्ध सिपाहियों के लिए पेंशन नियत की। पर वह मज़बूत शासक नहीं था, अतः सुव्यवस्था नहीं ला सका। बंगाल में विद्रोह हुआ और वह स्वतंत्र हो गया (१३१३); सिन्ध पर भी वह हावी नहीं हो सका। उसने गुलाम बड़ी संख्या में लिए, जिससे कृषि को हानि हुई। शियाओं और हिन्दुओं को कत्ल किया और जजिया को जारी रखा; मज़दूरों पर तो इसे हटाया, पर ब्राह्मणों पर भी लगा दिया। १३८८ में मरा। उसके उत्तराधिकारियों ने सल्तनत को विघटित ही किया। ६ वर्ष बाद दो शासकों ने एक साथ राज्य किया, जिनमें एक मुहम्मद शाह था।
(४) मुहम्मद शाह, १३९४-१४१४ — उसके राज्यकाल में तैमूर आया। वह ५०,००० घुड़सवार लेकर सिन्धु पार हुआ और तालम्ब को नष्ट कर डाला। वहां के निवासियों को मारा या गुलाम बनाया। मारता और जलाता वह बीकानेर पहुँचा और उसके प्रत्येक नर-नारी को काट डाला और शहर को राख कर दिया। फिर वह दिल्ली में निर्बाध घुस गया और सम्राट घोषित हुआ। जनता और उसके सैनिकों में कुछ टक्कर हो गई और उसने कत्ल आम का हुक्म दिया। पांच दिनों तक दिल्ली के घरों और गलियों में रक्तपात होता रहा। अन्त में वह लूटकर समरकन्द चला गया। सारे सोने और चांदी के चले जाने से देश में सिक्के न रहे और उनका दाम बहुत बढ़ गया। अकाल
और महामारी फैल गई जिससे दिल्ली को पनपने में पचास वर्ष लग गए। मु. तुगलक, जो गुजरात भाग गया था, तैमूर के चले जाने पर लौटा और १४१४ तक राज्य किया।
(७) सैयद वंश (१४१४-५०) :— दिल्ली सल्तनत अब नगर तक ही सीमित रह गई थी। इस पर अब पंजाब के एक भूतपूर्व गवर्नर खिज्र खां का अधिकार हुआ। उसके तीन उत्तराधिकारी भी हुए। धीरे-धीरे दिल्ली पनपने लगी।
(८) लोदी वंश (१४५०-१५२६) :—
(१) बहलोल लोदी ने दिल्ली को कमज़ोर पा पंजाब में स्वाधीन होकर फिर दिल्ली पर अधिकार कर लिया (१४५०) और उसकी पुरानी प्रतिष्ठा लौटाई। जौनपुर के राजा को हराया। मृ. १४८८।
(२) उसके पुत्र सिकंदर लोदी ने जौनपुर को ले लिया और बिहार को भी लेकर तिरहुत से खिराज लिया। मृ. १५१७।
(३) उसका पुत्र इब्राहिम लोदी अफ़गान रईसों को नियन्त्रित नहीं रख सका। यहाँ तक कि दौलत खां लोदी ने बाबर को निमन्त्रित किया। बाबर ने दौलत खां लोदी से पीछा छुड़ाकर पानीपत के मैदान में इब्राहिम को हरा दिया और गद्दी पर बैठा (१५२६)।