मुग़ल - प्रभुत्व
मुग़ल - प्रभुत्व
(१) बाबर :-
पंजाब के सूबेदार दौलत खां का निमन्त्रण पाकर बाबर पंजाब में आया (१५२४), और लाहौर ले लिया, दौलत खां को हरा दिया। अप्रैल १५२६ में उसने पानीपत में इब्राहिम लोदी को हराया। फिर उसने दिल्ली और आगरा पर अधिकार किया और अफ़गान सरदारों को मिला लिया। हुमायूँ ने बिहार और जौनपुर के मुस्लिम राज्य ले लिए और बाबर दक्षिण में हिन्दू राज्यों की ओर बढ़ा। राणा संग्राम सिंह हिन्दू भारत की ओर से आगरा की ओर बढ़े और सीकरी से १० मील दूर खनुआ में लड़ाई हुई। तोपों से बाबर फिर जीता (१५२७)। १५२८ में उसने चंदेरी का गढ़ ले लिया जिसके रक्षक बड़ी वीरता से लड़े। राणा का पुत्र बाबर के सामने नत हुआ। बाबर वहां से लौटकर कन्नौज पहुंचा और पटना के निकट गंगा-तट पर अफ़गान नेताओं को हराया (१५२९)। १५३० में मरा।
२. हुमायूँ :- गुजरात के बहादुर शाह ने मालवा जीत लिया था और खानदेश, अहमदनगर और बरार को अधीन राज्य बना लिया था। उसने चित्तौड़ को भी हराया था। ऐसे प्रतिद्वन्द्वी के विरुद्ध हुमायूँ ने आक्रमण किया (१५३५)। बहादुर हार गया और चम्पानर का किला हुमायूँ के हाथ लगा।
पर इसी समय शेरशाह पूर्व में प्रबल हो गया था। हुमायूँ चला, चुनारगढ़ को ले लिया और गौड़ तक चला गया। (१५३८) वहां से लौटता हुआ बक्सर के निकट शेरशाह ने उसे बुरी तरह हराया (१५३९)। १५४० में उसने फिर हुमायूँ को हरा दिया कन्नौज में और दिल्ली का बादशाह बन बैठा।
शेरशाह ने हिन्दू और मुसलमान दोनों का हित साधा। कृषि को खूब प्रोत्साहन दिया। सिन्ध से बंगाल तक बड़ा राजपथ बनाया जिसकी सुरक्षा और सुविधा के लिए दोनों ओर वृक्ष लगवाए, पुलिस स्थापित की, सरायें बनवाईं और कुएं खुदवाए। डाक के लिए उसने सवारवाहकों की व्यवस्था की। अदालती और फ़ौजदारी कानूनों की संहिताएं बनवाईं। एक आदर्श भूमिकर-पद्धति स्थापित की, जो ज़मीन की नाप और उपज के मूल्य के अनुसार बनी। मृत्यु १५४५।
हुमायूँ सिंध गया, और फिर फ़ारस (१५४४) जिसकी सहायता से उसने कन्धार (४५) और फिर काबुल जीता। फिर कामरान को हराकर अफ़गानिस्तान का स्वामी हुआ। शेरशाह मर चुका था। उसके अंतिम उत्तराधिकारी का मन्त्री हेमू हिन्दू था, जिसके विरुद्ध अफ़गानों ने विद्रोह किया। हुमायूँ ने सिन्धु पार की और शत्रुओं को हराकर दिल्ली और आगरा पर अधिकार किया (१५५५)। १५५६ जनवरी में मर गया।
३. अकबर :- हेमू ने दिल्ली और आगरा ले लिया और पानीपत में बैराम खां से लड़ा। बैराम की विजय हुई (१५५६) और अकबर गद्दी पर बैठा। बैराम ने पंजाब (मुल्तान सहित) और गंगा-जमुना दोआब की पुनर्विजय की और ग्वालियर के किले को लिया। १५६० में वह बर्खास्त कर दिया गया, पर अकबर अभी स्वतन्त्र नहीं हुआ। इसी काल में आधम खां ने मालवा ले लिया (१५६२)।
इस समय से अकबर स्वतन्त्र हुआ। १५६७ में उसने चित्तौड़ को घेरा। उदयसिंह भाग गया, पर किला लड़ता रहा। जयमल के मारे जाने पर उसका पतन हुआ और राजपूत राजाओं ने अकबर का प्रभुत्व स्वीकार किया। राजपूताना साम्राज्य का प्रान्त हो गया। १५७३ में उसने गुजरात को लिया। बंगाल के दाऊद खां ने अकबर का विरोध किया, पर १५७६ में राजमहल के युद्ध में हरा दिया गया। उड़ीसा १५९२ में लिया गया। १५९४ तक कश्मीर, पेशावर, सिन्ध और कन्धार ले लिए गए। खानदेश पर प्रतिरोध रहित आधिपत्य हुआ। अहमदनगर एक बड़े युद्ध के बाद हाथ आया। अकबर ने स्वयं असीरगढ़ पर चढ़ाई की, पर भ्रष्टाचार द्वारा ही उसे ले सका। बरार भी साम्राज्य में आया (१५९५-१६०१)।
उसने टोडरमल और अबुल फ़ज़ल जैसे सलाहकार रखे जिनकी सलाह से राजपूत राजाओं और हिन्दू जनता की सद्भावना प्राप्त की। विजित राजाओं को साम्राज्य की सेवा में लिया। हिन्दू-मुस्लिम भेद दूर किया और अन्तर्जातीय विवाह चलाया। अपनी राजपूत पत्नियों के पुरुष संबंधियों को राजपरिवार का सदस्य समझा। हिन्दू रानियां हिन्दू धर्म पालने को स्वतन्त्र रहीं। हिन्दू, मुग़ल और अफ़गान एक साथ साम्राज्य के लिए लड़ते थे। उसने १३००० घुड़सवारों को लेकर २०००० से लड़ा। ११ दिन में ६०० मील चला।
हिन्दुओं पर से तीर्थयात्रा कर और जजिया उठा दिया। उसने सती-प्रथा को रोका। बाल विवाह रोका, विधवा विवाह प्रोत्साहित किया। जागीर-प्रथा बन्द कर सैनिकों को वेतन देने की प्रथा जारी की। टोडर मल की भूमिकर-पद्धति में भूमि तीन वर्गों में बाँटी गई और ठीक-ठीक नापी भी गई और कर भूमि की उपज और विस्तार दोनों पर नियत किया गया। कर-संग्रह का काम स्थानीय कर्मचारी अमल गुज़ार को सौंपा गया जिसका काम किसानों का हित-साधन था। वह कर-संग्राहक, हाकिम और पुलिस अफ़सर तीनों था। सरकार का भाग उपज का तिहाई था।
साम्राज्य १८ सूबों में बाँटा गया, प्रत्येक एक वाइसराय के अधीन। प्रत्येक सूबा ज़िलों और परगनों में बाँटा गया। मुक़दमे जातियों के अपने नियमों के अनुसार देखे जाते थे। सभी महकमों पर अकबर की नज़र रहती थी।
४. जहांगीर :- उसके पुत्र खुसरो ने स्वयं राज्य पाने के लिए विद्रोह किया। जहांगीर ने उसका पीछा किया और चुनाव (झनाव) पर उसे पकड़ा। उसकी सेना को हराकर उसे बन्दी बना लिया। उसके सैनिकों को कड़ी सज़ा दी और उसे जीवन भर बन्दी रखा। १६२२ ई. में उसके रक्षक खुर्रम ने उसे मार डाला।
जहांगीर स्वयं पियक्कड़ होते हुए भी दूसरे पियक्कड़ों को दंड देता था। १६११ में उसने नूरजहां से विवाह किया। नूरजहां का प्रभाव सरकारी मामलों पर बेहद था। उसके पिता इत्मादुद्दौला और भाई असफ़ खां अमीर बनाए गए और मंत्री बने। नूरजहां साम्राज्य पर शासन करने लगी जो उदार और दयालुतापूर्ण था। जहांगीर की निष्क्रियता के बावजूद साम्राज्य का कार्य भलीभांति चलाया गया, १६११-२५।
खुर्रम ने राणा अमर सिंह को अधीनता स्वीकार करने को बाध्य किया (१६१४)। फिर उसने १६१६ में विद्रोही मलिक अम्बर को हराकर अहमदनगर का किला ले लिया। फिर १६२२ में कन्धार की पुनः प्राप्ति के लिये खुर्रम को नूरजहां ने वहां जाने का हुक्म दिया। इससे वह अपने दामाद शहरियार को जहांगीर का उत्तराधिकारी बनाना चाहती थी। खुर्रम ने अस्वीकार कर दिया। इस पर उसकी अधिकांश सेना छीन कर शहरियार को दे दी गई। खुर्रम ने आगरा लेना चाहा। महाबत खां ने उसे मालवा होते हुए दक्षिण भगा दिया, जहां से वह बंगाल जाकर फिर हरवाया गया। तब उसने हार मान ली। शहरियार युवराज बनाया गया, १६२५।
महाबत खां सेना में बहुत शक्तिशाली हो गया। नूरजहां उसे हटाना चाहने लगी, १६२६। महाबत ने सम्राट् और सम्राज्ञी को काबुल के मार्ग में घेरा और सम्राट् को बन्दी बना कर ले भागा। नूरजहां ने ज़ोर आजमाना चाहा, पर हार गई। तब चालाकी से जहांगीर को छुड़ा लिया। महाबत शाहजहां से मिल गया। अब असफ़ खां भी, जिसका दामाद खुर्रम था, उनकी ओर हो गया। जहांगीर १६२७ में मर गया और नूरजहां प्रभुत्वहीन हो गई।
५. शाहजहां :- जहांगीर की मृत्यु के समय खुर्रम दक्षिण में था और शहरियार युवराज। पर असफ़ खां ने खुसरो के पुत्र को गद्दी पर बैठा दिया और शहरियार को कैद करके अन्धा कर दिया। खुर्रम राजधानी पहुंच कर सम्राट् घोषित हुआ। उसने बाबर के सभी वंशजों को मार देने का हुक्म दिया।
जब वह भागकर बंगाल गया था, तो पुर्तगीज़ों ने उसकी सहायता जहांगीर के विरुद्ध नहीं की थी। वे जलडकैती भी किया करते थे और क्षेत्र विस्तार के लिए भी प्रयत्नशील थे। हुगली के किले पर तोप लगा रहे थे। शाहजहां ने १६३२ में हुगली के घेरे का आदेश दिया जो १४ दिन के बाद ले लिया गया। पुर्तगीज़ पकड़े या मारे गए।
डेक्कन का वाइसराय अफ़गान खांज़हां लोदी ने अहमदनगर के शाह से मिलकर विद्रोह किया (१६३०)। पर शाही फ़ौज ने उसे हरा कर मार डाला (१६३२)। फिर फ़ारस वालों ने कन्धार ले लिया (१६४८)। तीन बार सेना भेजी गयी, दो बार औरंगजेब के नेतृत्व में, एक बार दारा के। पर तीनों असफल हुईं।
खांज़हां लोदी के बाद दक्षिण में उथल-पुथल थी। औरंगजेब वहां का वाइसराय बना कर भेजा गया। उसने एक-एक कर विद्रोही किले ले लिये और अहमद नगर को राज्य में मिला लिया (१६३७)। बीजापुर और गोलकुंडा खिराज देने को मजबूर किया (१६३६)। १६५२ में वह फिर दक्षिण का राजप्रतिनिधि हुआ। कंधार की हार की प्रतिष्ठा हानि की पूर्ति के लिए उसने गोलकुंडा पर युद्ध लादा और उसे घेर लिया। शाहजहां और दारा के बचाव से गोलकुंडा तो बच गया पर उसे एक बड़ा हर्जाना और भूभाग देना पड़ा (१६५६)। फिर उसने बीजापुर को घेरा। इसी बीच शाहजहां बीमार पड़ा और वह बीजापुर से केवल अर्थदंड ले आगरा लौटा (१६५७)।
शाहजहां ने नई दिल्ली (शाहजहानाबाद) बनवाई और वहां राजधानी ले गया। उसने आगरा में ताजमहल और मोती मस्जिद और दिल्ली में जामा मस्जिद बनवाई। मोर सिंहासन (Peacock Throne) भी बनवाया। वह प्रतिवर्ष अपने को सोने से तुलवाता था जिसे गरीबों में बांटा जाता था। फिर भी उसका खजाना भरा रहा। उसके राजस्व मंत्री मुर्शिद कुली खां थे, जो टोडरमल के शिष्य थे जिन्होंने टोडरमल की पद्धति को दक्षिण में भी लागू किया। इससे आमदनी ड्योढ़ी हो गई। शाहजहां देश के नागरिक शासन को कड़ाई से देखता था और राजपथों की सुरक्षा के लिए सचेष्ट था। कृषि और व्यापार उन्नति पर थे। पर उसके दंड कठोर हुआ करते थे।
उसके बीमार पड़ने पर (१६५७) शुजा ने अपने को बंगाल में सम्राट घोषित किया और मुराद ने अहमदाबाद में। दारा उन्हें सम्राट की निरपद अवस्था बताता रहा। शुजा ने आक्रमण कर दिया जिसे दारा ने हराया था। पर औरंगजेब और मुराद ने मिलकर उसे धर्मत और सामूगढ़ की लड़ाइयों में हरा दिया (१६५८)। तब से आठ वर्ष तक शाहजहां आगरा के राजमहल में कैद रहा। औरंगजेब ने मुराद को शराब की बेहोशी में कैद कर लिया और दो वर्ष बाद मरवा दिया। मुराद को कैद कर उसने दारा का पीछा किया और उसे भी कैद कर मरवा डाला। शुजा औरंगजेब से हारकर ढाका और फिर आराकान भाग गया जहाँ वह परिवार सहित कत्ल हुआ।
६. औरंगजेब :- १६५८ से ही वह शासन करने लगा। १६६३ में मीर जुमला ने, जो बंगाल का सूबेदार था, आसाम को जीता। १६६६ में शाइस्ता खां ने आराकान जीत कर साम्राज्यगत कर लिया। १६७२ में सतनामी विद्रोह दबाया गया और विद्रोही नारनौल (दिल्ली से द.प.) में हराये गये। १६७८-८० तक राजपूतों का देश बर्बाद किया गया। उसके बाद शाहजादा अकबर को हराकर दक्षिण और फिर फ़ारस खदेड़ दिया गया (१६८०)। १६८६ में बीजापुर साम्राज्यगत हो गया। १६४४-१७०७ वह मराठों से लड़ता रहा, जिसमें सफल नहीं हुआ। अन्त में बीजापुर, गोलकुंडा आदि उनकी अधिकृत कृष्णा के दक्षिण की सारी भूमि अपने में कर ली गई। भारत के दक्षिणान्त के पोलीगार भी खिराज देने को बाध्य किए गए। सिन्धु से कावेरी तक साम्राज्य फैल गया। भूमिकर से आमदनी ४८ करोड़ रुपए हो गई जो अकबर से दूनी थी और सारा राजस्व १२० करोड़।
पर वह शक्की था। अपने अफसरों को उनकी ज़मीन से दूर रखता था और उनकी पुत्र-पत्नियों को अपने दरबार में ज़ामिन (bond) रखता था। अपने पुत्रों के साथ भी वैसा ही बर्ताव करता था और अपने द्वितीय पुत्र को ६ वर्ष कैद में केवल शक पर रखा। हिन्दुओं को वह काफ़िर और शियों को गद्दार समझता था, जिससे राजस्थान और दक्षिण के हिन्दू उससे असन्तुष्ट हो गए और बीजापुर और गोलकुंडा के साथ युद्ध में सेना कमज़ोर हो गई। (वे शिया थे)।
उसने बहुत से हिन्दू मंदिर गिरवा दिए। धार्मिक कट्टरता से ही सतनामी विद्रोह खड़ा हुआ था। उसने जजिया फिर से जारी कर दिया। हिन्दुओं और मुग़लों का मेल-मिलाप बन्द कर दिया और नागरिक शासन तथा सेना के उनके सभी पदों को छीन लिया। उसने जोधपुर के जसवंत सिंह के पुत्रों को पकड़ना चाह्णा, उन्हें ज़ामिन रखने या मुसलमान बनाने के लिए। इससे अकबर-राज्य छोड़ सारा राजपूताना बिगड़ खड़ा हुआ। १६७९ में उस पर आक्रमण हुआ, हिन्दू मन्दिर सबके सब नष्ट किए गए और जनता को भूखों-मरने वाला युद्ध उन पर आ गया। १६८१ में राजों को और भूमि देनी पड़ी, पर विद्रोह अंशतः ही दमित हुआ, और राजपूत परम कट्टर शत्रु हो गए। छापामार युद्ध चलाते रहे।
दक्षिण में भी यही नीति चली। शिवाजी ने असंतुष्ट हिन्दुओं को एकत्र कर अपनी सैनिक कार्यवाही का क्षेत्र बढ़ाया। औरंगजेब ने शाइस्ता खां को भेजा। शिवाजी ने उसके पुत्र को मारा और वह मुश्किल से बच पाया। वहाँ भी छापामार युद्ध होने लगा। बीजापुर और गोलकुंडा मराठों के विरोधी थे, पर उससे लड़कर उन्हें नष्ट कर दिया। बीजापुर के बादशाह सिकंदर को अजन्म कारावास मिला। गोलकुंडा को वह शस्त्र-बल से नहीं ले सका, घूस देकर लिया। इससे उसकी सेना कमज़ोर हो गई। मराठे निर्भय हो गए। उन राज्यों के सिपाही डाकाज़नी करने लगे।
मुग़ल साम्राज्य का विघटन, १७०७-१८५८
(१) १७०७-१७४८ :- इस बीच में ४ राजा हुए: बहादुर शाह (५ वर्ष), जहान्दर शाह (१ वर्ष), फर्रुखसियर (६ वर्ष), और मुहम्मद शाह (२९ वर्ष)। मुहम्मद शाह के पहले के दो राजा केवल कुछ महीने राज्य कर सके। इन राज्यों के काल में सिक्खों ने राज्य का संतुलन बुरी तरह बिगाड़ा। राजपूतों ने स्वाधीनता प्राप्त कर ली (१७०८)। मराठे दक्षिण के मुग़ल प्रान्तों से चौथ लेने लगे (१७३१-१७४१) और सिरोंज की सन्धि (१७३८) के अनुसार मालवा और नर्मदा-चम्बल की समस्त भूमि प्राप्त कर ली। १७४० तक पांच मराठा राज्यों की भूमि के लिये मुगल राज्य और सिमटा। साम्राज्य के बंगाल, बिहार, अवध, हैदराबाद और कर्नाटक के मुस्लिम प्रान्त स्वतन्त्र हो गए। और त्रिचनापल्ली, मैसूर, मालाबार, त्रावणकोर और कोचीन में हिन्दू राज्य बन गए। १७३९ में फ़ारस का बादशाह नादिरशाह दिल्ली आया, उसके निवासियों का कत्ल किया, और मोर सिंहासन, शाही खज़ाना और जनता की सम्पत्ति लूट कर लौट गया। १७४८ तक मुगल साम्राज्य सतलज, गंगा, चम्बल और राजपूताना के बीच में सिमट गया।
(२) १७४८-१८५८ :- १७४९ में फ़ारस के अहमदशाह ने चढ़ाई की, पर सरहिन्द में हारकर लौट गया। १७५१ और ५४ में फिर चढ़ आया और बड़ी क्षति पहुँचाई। १७६१ में दिल्ली ले ली।
१८५७ में बहादुर शाह ने विद्रोहियों का साथ दिया और सिंहासन से हटाकर रंगून भेज दिया गया। उसके दो पुत्र और पोते मार डाले गए।