बाहमनी राज्य
बाहमनी राज्य
इसे १३४७ में दिल्ली सुलतान के एक तुर्की अफ़सर ने मुहम्मद तुगलक के काल की फूट से लाभ उठाकर स्थापित किया। वे अपने को एक पुराने फ़ारसी राजा बहमन का वंशज कहते थे। उन्होंने दोआब को अधिकृत कर अपने को सुलतान घोषित किया। यह राज्य ताप्ती से कृष्णा-तुंगभद्रा तक और कोंकण से वेनगंगा तक फैला था। इसकी पहली राजधानी गुलबर्गा थी, और पिछली बीदर। सुलतान अलाउद्दीन I के नाम से गद्दी पर बैठा।
कुल मिलाकर १८ राजा हुए, जिनके राज्य अपनी हिन्दू प्रजा या पड़ोसी हिन्दू राज्यों से लड़ते हुए बीते। वे निरंतर भय में रहे, केवल पांच स्वाभाविक मृत्यु से मरे। इनमें मुहम्मद II (१३७८-९७) के राज्य में युद्ध या विद्रोह नहीं हुआ। महमूद शाह (१४८२-१५१८) के बाद चार राजा और हुए और अपने १८० वर्ष की स्थिति के बाद १५२६ में इस राज्य का अन्त हो गया। इस राज्य में जनता की दशा अत्यन्त दयनीय थी, यद्यपि रईस धनाढ्य समृद्ध और विलासी थे। समृद्ध मुसलमान थे, गरीब हिन्दू जो अपने धर्म के लिए सताए जाते थे, और युद्ध तथा अकाल से पीड़ित हुआ करते थे। बाहमनी राजाओं ने आनेवाली पीढ़ियों के लिए कोई लाभ की चीज़ नहीं छोड़ी, पर उनके किले दुर्भेद्य, भव्य और कलात्मक थे और उनकी धनाढ्यता को सूचित करते हैं।
(१) बरार १४८४ में स्वतंत्र हो गया और १५७४ में अहमदनगर में विलीन हो गया। (२) बीदर का सूबेदार यथार्थतः १४९२ में स्वतंत्र हो गया, पर बाहमनी प्रभुत्व नाम को मानता रहा जहां उसका प्रभाव सर्वोपरि था। १५१८ से वही बाहमनी सुल्तान बनाया-बिगाड़ा करता था। १५२६ से वह सर्वथा स्वतंत्र हो गया। १६०९ में वह बीजापुर में विलीन हो गया। (३) गोलकुंडा १५१८ में स्थापित हुआ और १६९१ से मुग़ल साम्राज्य के इतिहास से गुंथ गया। १६३७ में उसमें मिला लिया गया। इसकी राजधानी पहले वारंगल थी, फिर गोलकुंडा हुई और अन्त में भागनगर जो पीछे हैदराबाद कहलाया। इस राज्य में धार्मिक सहिष्णुता बरती गई और हिन्दू भी शासन की सेवा में लिए गए। (४) अहमदनगर १४९० में स्थापित हुआ। दौलताबाद इसका सबसे महत्वपूर्ण नगर था। इस राज्य के शासकों ने पहले बीजापुर के विरुद्ध विजयनगर का साथ दिया (१५५०), पर पीछे उसके शत्रुओं का, और उसके विनाश में प्रमुख भाग लिया (१५६५)। इसकी रानी चाँदबीबी ने शाहज़ादा मुराद से अहमदनगर की रक्षा की (१५९६) पर १६०० में दानियाल ने आक्रमण किया। रानी एक धोखेबाज़ हिजड़े द्वारा मारी गई और अहमदनगर मुगल साम्राज्य में मिल गया। (५) बीजापुर की नींव १४८९ में पड़ी।
यूसुफ़ आदिल शाह (१४९०-१५१०) शिया थे और प्रजा को शिया बनाना चाहते थे। इससे प्रजा तथा पड़ोसी राज्यों में असंतोष फैला और अन्य सलतनतों ने उन पर चढ़ाई की। तब उन्होंने ऐसा करना छोड़ दिया। उन्होंने एक हिन्दू पत्नी से विवाह किया और हिंदुओं को राज-सेवा में स्थान दिया। चौथे सुल्तान इब्राहिम आदिल शाह I (१५३५-५७) सुन्नी हो गये और दक्षिणी और अबीसिनियों का पक्ष लिया, फारसी तथा अन्य विदेशियों का नहीं। अली आदिल शाह (१५५७-८०) फिर शिया हो गये और सुन्नियों को सताया जिससे अशान्ति रही और उन्नति नहीं हो सकी।
यूसुफ़ आदिल शाह के राज्यकाल में ही अलबूकर्क ने १५१० में गोवा ले लिया। बादशाह ने उसे छीना, पर उनकी मृत्यु के बाद पुर्तगीज़ों ने उसे फिर ले लिया और तब से वह उन्हीं का रहा। अली आदिल शाह ने विजयनगर के राम राय से मिलकर अहमदनगर को बर्बाद किया और भयानक उत्पात मचाया (१५५८)। फिर अहमदनगर, बीदर और गोलकुंडा से मिलकर तालीकोट के युद्ध में (१५६५) विजयनगर को नष्ट कर दिया। १५७० में अहमदनगर से मिलकर गोवा को घेरा पर उसे ले नहीं सके और पीछे हट गए। इब्राहिम आदिल शाह II ने अहमदनगर से युद्ध किया (१५९५) जिसमें उसका राजा मारा गया। अन्तिम दो शाहों को शिवाजी और मुग़लों से लड़ना पड़ा, जिनमें उन्हीं का पराभव हुआ और १६७३ में राज्य का अन्त हो गया। अहमदनगर, बीजापुर और गोलकुंडा ने विशिष्ट स्थापत्य कला का विकास किया। बीजापुर के भवनों की भव्यता अद्वितीय थी। बीजापुर और अहमदनगर में पुस्तकालय भी संग्रहीत हुए।