प्राचीन काल
प्राचीन काल
(१) जातकों से ज्ञात होता है कि क्षत्रिय अब योद्धा नहीं, शासक हो गए थे और उनका स्थान समाज में प्रथम हो गया था। राजा शत्रुओं से प्रजा की रक्षा करता था और शान्तिकाल में न्याय का शासन करता था। उसे अन्न कर दिया जाता था। राजा वंशानुगत होता था, पर अयोग्य होने पर नया राजा चुना जाता था। पुरोहित ही प्रधान मंत्री होता था। सेनापति का स्थान राजा के बाद दूसरा था। शान्तिकाल में वही न्यायाधीश होता था। भूमि-मापक, अन्न-मापक, कोटपाल, दौवारिक, कोषपाल, सारथि आदि राज कर्मचारी होते थे। राजघाट ही राज्य का एकमात्र नगर होता था। शेष ग्राम होते थे।
ग्राम स्वशासित होते थे। उनका एक प्रमुख होता था, जो न्यायाधीश का भी कार्य करता था। जाति-प्रथा प्रचलित थी, पर क्षत्रिय ब्राह्मण से बड़ा था और शूद्र चतुर्वर्ण से बाहर था। सोना-चांदी, हाथीदांत, आदि के काम करने वाले, बढ़ई, जुलाहे, हज्जाम, कसाई, टोकरी बनाने वाले, चमार, कुम्हार, सपेरा आदि के धंधे होते थे। पर बहुसंख्यक कृषक थे। धंधे मुहल्लों में बंटे होते थे। व्यापारियों और यात्रियों के संघ होते थे। आर्य विशेषतः कृषक थे, और ब्राह्मण कृषकों में प्रमुख।
संन्यासी सभी श्रेणी के होते थे, विशेषतः क्षत्रिय। राजा वानप्रस्थ होकर संन्यासी हो जाते थे। इनके संघ होते थे। ये भिन्न भिन्न प्रकार के कठोर तप करते थे। ये प्रश्नोत्तर द्वारा जनता को शिक्षा भी देते थे।
(२) राजवंश — (क) शिशुनाग वंश (६००-३९१ ई. पू.) — इस वंश के दस राजाओं ने मगध राज्य पर राज्य किया। इनमें पांचवां बिम्बिसार (५२८-५००) था, जिसने नए राजगृह का निर्माण किया और अंग-राज्य को जीतकर मगध साम्राज्य की नींव डाली। उसके पुत्र अजातशत्रु (५००-४७५) ने कोशल को हराया और गंगा से हिमालय तक की भूमि को अपने राज्य में मिला लिया। उसने पाटलिपुत्र के दुर्ग का निर्माण किया। (ख) नन्दवंश — अन्तिम शिशुनाग महानन्द को गद्दी से हटाकर (३९१) उसका मंत्री महापद्मनन्द गद्दी पर बैठा और नन्द वंश की नींव डाली। उसके बाद उसके आठ पुत्रों ने राज्य किया, जिसमें से अन्तिम को चन्द्रगुप्त ने मार कर वंश का अन्त कर डाला।
(३) प्रमुख व्यक्ति — (क) बुद्ध (मृत्यु ४८३ ई. पू.) ने निर्वाण-प्राप्ति का उपाय बताया। निस्वार्थ और परोपकारमय जीवन से वासनाएं नष्ट हो जाती हैं, जिससे परमशान्ति या निर्वाण की प्राप्ति होती है। उनकी मृत्यु होने पर प्रथम बौद्ध सम्मेलन ने उसके सिद्धान्त स्थिर किए। तीन और सम्मेलन ३८३, २४०, और १२० ई. पू. में हुए। उन पर उसकी शाखाएं हो ही गईं। फिर भी वह भारत में १२५० ई. तक रहा। कुछ परिवर्तित रूप में यह पूर्व एशिया, तिब्बत और चीन में फैला और १२०० ई. के बाद भी कायम रहा। (ख) महावीर ने अपने धार्मिक जीवन के प्रथम वर्ष एक मठ में बिताए। फिर इन्होंने देश-भ्रमण किया और अन्त में एक मठ स्थापित किया। यहीं इन्होंने अपने शिष्यों को पुनर्जन्म के क्लेश से मुक्ति का उपाय बताया। इसके शिष्य अपने को जैन (स्वयं को जीतने वाले) कहते थे। इनके सिद्धान्त के अनुसार आत्मनियन्त्रण और आत्मपीड़न के निरन्तर अभ्यास से कर्मफल से मुक्ति मिल जाती है और दिव्य पुरात्व प्राप्त हो जाता है। वे छोटे से छोटे जीव और पौधे तक को नहीं मारते, क्योंकि इससे ईश्वरत्व के प्रति अपराध होता है। जैन धर्म अपनी कठोरता के कारण लोकप्रिय नहीं हो सका।
(४) पारसीक आक्रमण — साइरस (५५८-५३० ई. पू.) या कैखुशरु ने अफगानिस्तान और बलुचिस्तान पर अधिकार किया। डेरियस (५२२-४८६) ने सिन्धु नदी तक अपना आधिपत्य बढ़ाया और इसे एक सत्रपी बनाया। उनके पुत्र ज़र्कसेज़ (४८६-४६५) हुई। डेढ़ सौ वर्ष बाद डेरियस III की सेना में भारतीय सैनिक थे।