प्रागैतिहासिक काल
प्रागैतिहासिक काल
(१) महेंजोदारो सभ्यता — खुदाई से ३००० ई. पू. का एक नगर महेंजोदारो निकला है, जो योजना के अनुसार बना था। इसमें सड़कों, गलियों के जाल बिछे हैं जिनमें १८-२५ फीट ऊँचे, पक्की और कच्ची ईंटों के बने घर हैं। ईंटों की मुटाई, चौड़ाई और लम्बाई के अनुपात क्रमशः १:२:४ है। घर प्रायः दुमंजिले हैं, जिनमें आँगन है और उनके किनारों पर कमरे हैं। इन घरों में कुएं, स्नानघर और पाखाने भी हैं। नगर में नालियों की भी व्यवस्था है।
हार, पत्थर के गुँथे दाने, करधनी चांदी, तांबे और कांसे के बरतनों में रखे मिले हैं। नारी-मूर्तियां छोटे घांघर पहने हुए जो कमर-कसों से बंधे हुए हैं, मिली हैं। हार, कान के बाले, नाक के गहने, अंगूठियां, बाजूबन्द और पाजेब भी मिले हैं। आरा, छेनी, टाँगा, कुल्हाड़ी, तांबे की तलवार, भाला, गदा, छुरी, तीर, गदा भी पाए गए हैं। इनके अतिरिक्त चक्की, बतखरे, अस्तुरे, भांडे भी हैं।
ऐसी ही सभ्यता ४०० मील उत्तर-पूर्व हड़प्पा में भी पाई गई है। १००० मुहरें भी पाई गई हैं जिन पर पशुओं की आकृति तथा अन्य निशान हैं। यह लिपि पढ़ी नहीं गई है।
(२) द्रविड़ — कुछ विद्वान् इन्हें दक्षिण भारत के मूल निवासी मानते हैं और कुछ पश्चिम से आए हुए। इनका निवास स्थान दक्षिण भारत में था, और इनके अनेक सम्पत्तिशाली नगर थे। ये तमिल, कन्नड़, मलयालम, तुलु और तेलुगु भाषी क्षेत्रों में बसे थे और सिंहल से इनका निकट का संबंध था। इस भूमि में सोना, मोती, मिर्च, मसाला और तेलंगाना में सूती कपड़े की बहुतायत थी। वे देवों के पुजारी थे।
बलुचिस्तान में ५०००० ब्राहुई द्रविड़ भाषा बोलते हैं। तीस लाख मुंडारी मुंडा भाषा-भाषी हैं, जो प्रशांत महासागर के द्वीपों के परिवार की है; अतः ये पूर्व से आए होंगे।
(३) दस्यु — समस्त उत्तर भारत दस्युओं से बसा हुआ था। ये काले थे। ये दुर्ग और पुर बनाते और सोना तथा मदिरा के भांडार रखते थे। ये पेड़ों और सांप को पूजते थे।
(४) आर्य — ये दक्षिण रूस के घास के मैदानों से आए। ऋग्वेद में २५ नदियों के नाम हैं जिसमें कुछ सिन्धु की पश्चिमी और पांच उसकी पूर्वी शाखाएं हैं। अतः वे पहले पंजाब में बसे। पीछे वे यमुना और गंगा की घाटियों में बढ़ आए, जो यजुर्वेद से सूचित होता है जिसमें कुरुक्षेत्र और पांचाल के नाम हैं। उन्होंने दस्युओं को गुलाम बना लिया और समस्त उत्तर भारत में फैल गए, जो मनुस्मृति से स्पष्ट है। यह ग्रंथ इस भूमि को आर्यावर्त्त कहता है। दिल्ली और सतलज के ऊपरी भाग के बीच — सरस्वती और दृषद्वती की भूमि ब्रह्मावर्त्त कहलाती है; यहीं ऋग्वेद पूरा हुआ। यही कुरुक्षेत्र है, जो स्वर्ग के समान है। विन्ध्य के दक्षिण में वे नहीं जा सके, केवल इनके विचार और संस्थाएं गई।
ये प्रधानतः कृषक थे। धनुष और भाले का प्रयोग जानते थे। लोहार, स्वर्णकार, बढ़ई, हजाम, और कारीगर होते थे। इनमें जुलाहे भी थे। ये नाच, गान, दंगल और जुए के शौकीन थे। इन्द्र, वरुण, अग्नि (सूर्य, विद्युत, आग) की पूजा करते थे। सोम भी पीछे देवता (चंद्र) बन गया।
दस्युओं से लड़ने के लिए ये योद्धा बने। ऋग्वेद में कवच, सुनहले शिरस्त्राण, ढाल आदि की चर्चा है। ये पंखयुक्त नुकीले तीरों, तेज़ तलवारों और रथों से लड़े और हल के लोहे को तलवार बना डाला।
कई परिवारों पर ग्राम बने जिनकी पंचायतें प्रतिवर्ष चुनी जाती थीं। ग्राम जनों में संगठित हुए। जननायक अपने जन के ग्रामों को सुरक्षा देता था। धीरे-धीरे वह राजा हो गया और मन्त्रि-परिषद् की सहायता से राज्य करने लगा। पांचाल, कोशल, विदेह, मगध, काशी, और अंग राज्य हुए।
धर्म के क्षेत्र में, अनार्यों से सर्प-पूजा आई। असुर देवताओं की पूजा भी उन्हीं से आई। पूजा का विशेष भार अब पुजारियों पर आ गया और ब्राह्मण-वर्ग का विकास हुआ। यज्ञों की जटिलताएं बढ़ीं, देवताओं की संख्या भी बढ़ी, मूर्तियां और मन्दिर बने।
आर्य-जनों के बीच संघर्ष हुए जिसके फलस्वरूप इन्द्रप्रस्थ का राज्य बना। राम ने दक्षिण में भी विजय की। पर धीरे-धीरे ह्रास होने लगा। अनार्यों के मेल से अब सूर्यवंश के अलावे चंद्रवंश भी बना। राष्ट्र ५०० ई. पू. तक कई राज्यों में विभक्त हो गया।
ऋग्वेद-काल में केवल दो वर्ण थे : द्विज और अन्त्यज। द्विजों में कार्यभेद के अनुसार, आगे चलकर पुजारियों (ब्राह्मण), योद्धाओं (क्षत्रिय) और कृषकों (वैश्य) के भेद हुए। अन्त्यज वे थे जो श्रमिक और दास रहे। शूद्र वे अनार्य थे जिन्होंने आर्यों को आत्मसमर्पण किया।
वर्ण या वर्ग पीछे जातियों में बंट गए। पहले क्षत्रिय जाति ने पृथक् होकर प्रतिष्ठा प्राप्त की, फिर ब्राह्मण जाति ने, फिर विदेशी जातियों के भारत-आगमन के बाद उनके साथ विवाह-संबंध से अनेक जातियाँ बनीं। प्रत्येक जाति ने अपना अलग व्यक्तित्व बनाया और रोटी-बेटी के मामले में तथा पेशे के मामले में एक दूसरी से अलग रहीं।